इबारत ए इश्क

अन्फ़स (सुन्दर) ख्वाबों के मेरे शहज़ादे
सज़दे में तेरे मोती बिखराए रात भर
मेरी स्याह तन्हाई …
सिसकियाँ सरगम सुनाती रहीं रातभर
हकीक़त ए हाल(सच्चाई ) जान मुस्काए चंदा कमबख्त
सितारों के कारवां की निगाहे रहम (करुण दृष्टि) पर
जीती रही रात भर…
दिल्लगी का कागज़ यूँ ही कोरा रहा…
यादें आती जाती रहीं
इबारत ए इश्क को…
तरसता रहा रात भर
अहसास ए क़ुर्बत (समीपता का आभास) उनकी
आयत ए मोहब्बत शिद्दत से
पढ़ते रहे रात भर…

Author: Jyotsna Saxena (ज्योत्सना सक्सेना)

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