कर रक्खा

मेरे सपनों ने मुझे सुला कर रक्खा …
मेरे अपनों ने मुझे जगा कर रक्खा …

यूँ तो मुस्कान रही चेहरे पर हमेशा,
पर उदासी ने गला दबा कर रक्खा …

जीने के लिए चलना बहुत ज़रूरी था,
पर मन को शीत कब्र बना कर रक्खा …

कोई टूट कर मुझे चाहे मुमकिन ना था,
पर इस ख्वाहिश ने मुझे मिटा कर रक्खा …

मेरे मंसूबों में कहीं बहुत दम तो था,
पर सियासत ने मुझे झुका कर रक्खा …

रंग फीका हो न कभी वफ़ा का ‘गुँचा’,
उस के वादों ने मुझे सजा कर रक्खा …

Author: Neelam Nagpal Madiratta

Review Overview

1 (Poor)
1.5 (Below average)
2 (Average)
2.5 (Above average)
3 (Watchable)
3.5 (Good)
4 (Very good)
4.5 (Very good +)
5 (Outstanding)

Post your Rating

User Rating: Be the first one !

: यह भी पढ़े :

हम रीते ही मर जाएंगे…

युद्ध की आहट पर पनपता है प्रेमविदा होते हुए प्रेमीशिद्दत से चूमते हैं एक-दूसरे कोऔर …

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Translate »