"जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन"

जिस तरह देव स्मरण से मन और आत्मा को शांति, शक्ति, संतोष और पावनता मिलती है, उसी तरह आत्मा और मन को शुद्ध करने के लिए भोजन भी अहम होता है। यह भी वजह है कि संस्कारों से सराबोर सनातन संस्कृति में भोजन को ‘अन्नदेव’ पुकारा जाता है। धर्मग्रंथों में भगवान के दर्शन के लिए सबसे पहले अन्न को ही ब्रह्म रूप में देखने की सीख देकर लिखा गया है कि ‘अन्नं ब्रह्म इति व्याजानात्’। इस तरह जैसे देव उपासना में पावनता मायने रखती है, उसी तरह शुद्ध भोजन भी केवल शरीर के लिए ही नहीं बल्कि यह मानसिक और वैचारिक शक्ति के लिए भी जरूरी है। इसकी अहमियत व्यावहारिक तौर पर भी अक्सर बोलचाल में इस तरह सुनने में आती है कि ‘जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन’।

गौरतलब है कि आज के दौर में गुजरे जमाने की तुलना में भोजनशैली और व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। जाहिर है इससे इंसान की सेहत, सोच, स्वभाव और व्यवहार में भी हुए कई बुरे बदलाव अक्सर बीमारियों या उग्र स्वभाव के रूप में नजर आते हैं। प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथ मनुस्मृति में उजागर भोजन के दौरान किए जाने वाले ऐसे छोटे-छोटे उपाय, जो न केवल उम्र व यश बढ़ाने के साथ-साथ लक्ष्मी की भरपूर कृपा बरसाते हैं, बल्कि सही भोजन शैली भी सिखाते हैं। अगर आप स्वयं के साथ परिजनों को भी धनवान, सेहतमंद व दीर्घायु देखने की चाहत रखते हैं। मनुस्मृति में खासतौर पर भोजन के लिए सही दिशा में मुंह कर करने के अलावा भोजन के वक्त कुछ खास उपाय बेहद जरूरी हैं।
– भोजन से पहले आचमन करना चाहिए। बाद सिर, मस्तक आदि ऊपरी अंगों को गीले हाथों से छूना चाहिए।
– इसी तरह हाथ, पैर और मुंह को गीला कर भोजन करने से लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं। इस क्रिया को “पञ्चार्द्र” शब्द से भी पुकारा गया है।
– भोजन के वक्त बिल्कुल शांत रहना चाहिए।
– भोजन के सामने आने पर प्रसन्न होना चाहिए। मन की सारे तनाव अन्न के दर्शन कर भूल जाना चाहिए।
– अन्न का सम्मान करते हुए उसे पहले प्रतीकात्मक तौर पर प्राण वायु को देना चाहिए।
– फिर मन में इस भावना के साथ कि आप प्राणों के रक्षक व ब्रह्म स्वरूप हैं भोजन को नमस्कार करना चाहिए। इस तरह करना अन्न देव की पूजा बताई गई है।
– जिस भोजन को ग्रहण कर रहें हैं उसकी बुराई कतई न करें।
– भोजन के बाद भी आचमन और मुख प्रक्षालन यानी मुंह धोकर सिर, मस्तक आदि ऊपरी अंगों को गीले हाथों से छूकर उठना चाहिए।
– इस तरह से भोजन करने का शुभ फल यह है कि अन्न पूजा के साथ किया गया भोजन ताउम्र शक्ति और ऊर्जा देता है। वहीं ऐसा न करने से इन दोनों का ही नाश होता रहता है।
– भोजन के दौरान पूर्व दिशा में मुंह रखकर खाना खाने से उम्र बढ़ती है। चूंकि इस बात में यह भी सवाल मन मे आता है कि क्या रोज इस नियम के पालन से मृत्यु संभव नहीं। जबकि हर व्यक्ति की उम्र तय है तो इस नियम को मानने से उम्र कैसे बढ़ती है? इसलिए इस बात का गूढ़ अर्थ यह बताया गया है कि जब तक जिएंगे दुःख नहीं देंखेगे और किसी सुख का अभाव नहीं होगा।
– इसी तरह पश्चिम दिशा में मुंह रख भोजन करने से श्री यानी मान, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, वैभव व तमाम सुख-शांति के साथ लक्ष्मी कृपा बरसती है।
– दक्षिण दिशा की ओर मुंह रखकर भोजन करने से भरपूर यश मिलता है व उत्तर दिशा में भोजन करने से ऋत या सत्य मिलता है यानी व्यक्ति का जीवन सात्विक प्रवृत्ति व आचरण के साथ गुजरता है।
– भोजन शुरू करने से पहले ईश्वर स्मरण का विशेष महत्व है। शास्त्रों में भोजन से पहले कुछ विशेष मंत्रों से भगवान का ध्यान किए जाने का विधान बताया गया है, जिससे भोजन के वक्त मन में पवित्र भाव पैदा हो।

वैज्ञानिक नजरिए से भी शरीर में मौजूद कई ग्रंथियां विशेष रस पैदा करती है, जिनसे सभी अंग सही ढंग से काम करते हैं। भोजन के वक्त भी मंत्र बोलने से बने पवित्र भावों के कारण भोजन के पाचक रसों में दोष पैदा नहीं होते, जो शरीर और दिमाग को चुस्त-दुरुस्त रखने में फायदेमंद साबित होते हैं।

खास मंत्र –
आप विद्यार्थी हो, कामकाजी हो या गृहस्थ भोजन शुरु करने से पहले यहां शास्त्रों में बताया भोजन मंत्र जरूर बोलें –
ॐ सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु सह वीर्यम् करवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्मा हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतं
ब्रह्मैव तेना गन्तव्यंब्रह्म कर्म समाधिना।।

अच्छा या बुरा खान-पान तो सही और गलत सोच बनाने वाला भी माना गया है। इससे जीवन में सुख-दु:ख, सफलता या असफलता नियत होती है। कैसा और कितना खान-पान सेहत और सफलता के लिए जरूरी है? इसका जवाब महाभारत में बड़े ही सटीक तरीके से उजागर किया गया है।

खान-पान का बताया तरीका व्यक्ति को गजब के 6 फायदे देता हैं।
गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च।
अनाबिलं चास्य भवत्यपत्यं न चैनमाद्यूत इति क्षिपन्ति।।

सरल शब्दों में मतलब है कि स्वल्पाहार यानी थोड़ा या भूख से कम भोजन करने के ये छ: खास फायदे होते हैं।
– कम भोजन सेहत बरकरार रखता है और शरीर को भी ताकतवर बनाता है।
– भूख से थोड़ा सा कम खाने से पहला फायदा है कि व्यक्ति रोगी नहीं होता। क्योंकि ज्यादा खाना-पाचन में गड़बड़ी से कई बीमारियों की वजह बनता है। कम खाने से इनसे बचाव होता है।
– कम, नियमित और अच्छा खान-पान सुन्दर संतान का पिता बनने में भी अहम साबित होता है।
– जब व्यक्ति खान-पान नियंत्रित रख निरोगी रहता है तो जाहिर है कि उसकी उम्र बढ़ती है यानी लंबे वक्त तक जीवित रहता है।
– कम भोजन से सेहतमंद और बलवान शरीर मन, वचन व व्यवहार को भी साधकर जीवन के सारे सुख बटोरना आसान बना देता हैं।
– आखिर में कम खाने से जुड़ी व्यावहारिक तौर पर सबसे रोचक बात व फायदा यही है कि ऐसे व्यक्ति को कोई ‘ज्यादा खाने वाला’ यानी ‘पेटू’बोलकर ताना नहीं मारता, टोकता नहीं या फिर कोई उससे कतराता नहीं है।
– हिन्दू धर्म में भोजन जुड़ी परंपराओं में श्राद्ध हो या बलिवैश्वदेव अलग-अलग रूप में हर रोज भोजन का पहला ग्रास अलग-अलग प्राणियों को देना भी जरूरी बताया गया है। इनमें सबसे ज्यादा शुभ है- देवप्राणी गाय को गोग्रास देना।

जिस तरह देव स्मरण से मन और आत्मा को शांति, शक्ति, संतोष और पावनता मिलती है, उसी तरह आत्मा और मन को शुद्ध करने के लिए भोजन भी अहम होता है। यह भी वजह है कि संस्कारों से सराबोर सनातन संस्कृति में भोजन को 'अन्नदेव' पुकारा जाता है। धर्मग्रंथों में भगवान के दर्शन के लिए सबसे पहले अन्न को ही ब्रह्म रूप में देखने की सीख देकर लिखा गया है कि ‘अन्नं ब्रह्म इति व्याजानात्’। इस तरह जैसे देव उपासना में पावनता मायने रखती है, उसी तरह शुद्ध भोजन भी केवल शरीर के लिए ही नहीं बल्कि यह मानसिक और…

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