पापा ने समझाया और वह लगन से करने लगा काम

धवल 8 साल का था,वह जो भी काम करता बेमन से करता ,सुबह उठकर जैसे तैसे 2-4 ब्रश मुँह में लगाता,आधा अधूरा कुल्ला करता ,जैसे तैसे शरीर पर पानी डालकर दोस्तों के साथ बाहर खेलने पहुच जाता। 11 बजे घर आता जल्दी जल्दी खाना निगल कर स्कूल पहुँच जाता। वहाँ भी टूटे -फूटे अक्षरो में लिखता ,सारा दिन टीचर्स कि डांट खाता।घर आकर फिर आधे अधूरे काम करके घरवालों कि डांट खाता। कुल मिलाकर वह अपना कोई भी काम सलीके से नहीं करता था। उसे सब लोग ठीक से काम न करने के लिए टोकते लेकिन वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकल देता था।

दीवाली आने वाली थी। दीवाली कि सफाई में धवल के पापा ने पीतल का एक बड़ा टुकड़ा अटाले वाले को बेचा उसने270 रूपये धवल के पापा को दिए। धवल ने पूछा -“पापा उसने आपको इतने रूपये क्यों दिए? ये सुनकर उसके पापा के मन उसे समझाने का ख्याल आया उन्होंने उसे बताया -“बेटा ,ये तो बहुत कम रूपये है, यदि इसी पीतल के टुकड़े से कोई व्यक्ति बर्तन बना कर बेचता तो उसे कंही ज्यादा रूपये मिलते। और यदि इसी पीतल के टुकड़े से कोई कलाकार मूर्ति बना कर बेचता तो उसे बहुत सारे रूपये मिलते।

” कितने रूपये पापा?- नन्हे धवल ने आँखे चौड़ी कर के पूछा !

यही कोई दो या तीन हजार रूपये ,इतने सारे धवल को बड़ा आश्चर्य हुआ।” पापा क्या और कोई आदमी इस टुकड़े से 3 हजार से भी ज्यादा रूपये कमा सकता है?” -धवल ने पूछा

हाँ क्यों नहीं व्यक्ति जितना ज्यादा दिमाग लगाएगा और जितनी मेहनत करेगा ,उसी अनुसार दाम भी पायेगा। ” अगर कोई व्यक्ति इस पीतल से सुन्दर और आकर्षक गहने बना दे ,फिर उस पर सोने कि पॉलिश करके बाजार में बेचे तो वह और भी ज्यादा रूपये कमा सकता है। कितने ज्यादा ?

यही कोई 50 हजार तक या उससे भी ज्यादा , यह तो उसकी कलात्मकता पर निर्भर है कि वह कितने कमायेगा।

पापा की ये बातें सुनकर धवल सोच में पड़ गया ,कि कैसे एक ही पीतल के टुकड़े से ढेरों अलग – अलग चीजें बनायीं जा सकती है ,उसे देखकर पापा थोड़े मुस्कुराये फिर बोले -” तुमने अभी जो पीतल के टुकड़े की बारे में बातें की वही बातें हम इंसानो पर भी लागू होती है।

वो कैसे पापा ?धवल फिर अचरज में पड़ गया। पापा ने समझाते हुए कहा-हम अपने आसपास बहुत से लोगो को देखते हे ,उनमे से कोई डॉक्टर ,इंजीनियर ,एक्टर ,टीचर ,डांसर ,किसान ,नेता ,व्यापारी और भी न जाने कितनी तरह के पेशे वाले लोग रहते है ,लेकिन इन सब लोगो में भी अंतर रहता है ,इनमे से कोई अपना काम बिलकुल टालने कि आदत के अनुसार करता है तो कोई केवल तनख्वाह पाने के लिए और कोई बहुत सलीके से अपने काम को अंजाम देता है ,जिसे देखकर लोग वाह-वाह कर उठते है।

“हाँ ऐसा तो होता है, हमारी क्लास में भी अलग – अलग तरह के बच्चे है ,जो अलग -अलग तरह से होमवर्क करते है,किसी तो जीरो ,किसी को 5 और किसी को 10 में से 10 मार्क्स मिलते है। “-धवल ने सोचते हुए कहा। पापा समझ गए थे कि तीर सही निशाने पर लग चुका है।

वे फिर कहने लगे इन सब से आगे भी एक तरह के इंसान होते है ,जो अपने काम को पूजा कि तरह करते है,ऐसे लोग ही इतिहास में अपना नाम सुनहरी अक्षरों में लिख पाते है। काम सभी के पास एक जैसा होता है ,लेकिन उसे करने के तरीके सभी के अलग होते है। तो अपने काम को मेहनत ,लगन ,कलात्मकता और सही ढंग से करते है वही सफल और सुखी होते है।

अब मर्जी तुम्हारी है, तुम किस तरह से दुनिया में अपना नाम देखना चाहते हो ?

पापा कि बातें सुनकर धवल को समझ आ चुका था,अगले दिन से वह हर कlम को पूरी लगन से करने कि कोशिश में जुट गया।

Indore Dil Se - Artical

श्रीमती सुषमा दुबे

धवल 8 साल का था,वह जो भी काम करता बेमन से करता ,सुबह उठकर जैसे तैसे 2-4 ब्रश मुँह में लगाता,आधा अधूरा कुल्ला करता ,जैसे तैसे शरीर पर पानी डालकर दोस्तों के साथ बाहर खेलने पहुच जाता। 11 बजे घर आता जल्दी जल्दी खाना निगल कर स्कूल पहुँच जाता। वहाँ भी टूटे -फूटे अक्षरो में लिखता ,सारा दिन टीचर्स कि डांट खाता।घर आकर फिर आधे अधूरे काम करके घरवालों कि डांट खाता। कुल मिलाकर वह अपना कोई भी काम सलीके से नहीं करता था। उसे सब लोग ठीक से काम न करने के लिए टोकते लेकिन वह एक कान से…

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