होली

नेह, प्रेम, अपनत्व ले, आया होली पर्व ।
हृदय-ह्रदय से मिल रहे, रंग कर रहे गर्व ।।
अंतर्मन में हर्ष है, मन में है उल्लास ।
शोक रहे न शेष अब, बिखरे केवल हास ।।
संस्कार पलनें लगें, गूजें ऐसे गीत ।
प्रीति-प्यार के बंध में, बंधना हमको मीत ।।
कदम-कदम मिल बढ़ चलें, मिलें हाथ से हाथ ।
कृष्ण और राधा बनें, कभी न छूटे साथ ।।
फागुन की मस्ती पले, खिलने लगे उमंग ।
सजनी पर अब ना चढ़े, कोई दूजा रंग ।।
सामाजिक संवाद से, महके सकल समाज ।
ऐसा सुर, लय, ताल हो, इस होली पर आज ।।
मिलन पले, ना हो विरह, चहक उठे संसार ।
उर मिल उर से अब लिखें, जीवन का नव सार ।।
अमराई बौरा रही, कोयल देती कूक ।
फगुनाहट हर अंग में, मस्ती की है हूक।।
मन ने अनगिन लिख दिये, भावों भरे निबंध ।
चुपके-चुपके रच गये, कितने ही अनुबंध ।।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री

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