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बॉलीवुड में एक खास साल – भाग 2

1960 क्यो खास महत्व रखता है बॉलीवुड में आगे की चर्चा…

बॉलीवुड की त्रिमूर्ति यानी दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद – इन तीनो की भी कई फिल्में आई
दिलीप कुमार की फिल्में इस साल में मुग़ले आज़म से बॉलीवुड के शहंशाह बन चुके थे फिर उनकी फिल्म कोहिनूर आई, जिसने उन्हें और उरूज पर खड़ा कर दिया,
इसी फिल्म का मु.रफी का गया गाना “मधुबन में राधिका नाचे रे,,,,,आज तक नए गायकों के लिए शिक्षागत बना हुआ है,
राज कपूर की जिस देश मे गंगा बहती है, जिसमे उन्होंने खुद अभीनय के साथ निर्देशन भी किया था, दक्षिण की अभिनेत्री पद्मिनी ने हिंदी फिल्मों में कदम रखा था, इसी साल राज ने नूतन के साथ फ़िल्म छलिया भी बनाई जिसका एक गाना “डम डम डिगा डिगा मौसम,,,,, आज भी बॉलीवुड के सफल रैन सांग (बरसाती गांनो) में से एक मशहूर और मारूफ गाना है, श्रीमान सत्यवादी तीसरी फिल्म थी, यह फ़िल्म कुछ करिश्मा न कर पाई,
देव आनंद की इस साल में 6 फिल्में आई थी, मधुबाला के साथ जाली नोट, वहीदा रहमान के साथ काला बाज़ार, सुचित्रा सेन के साथ बम्बई का बाबू और सरहद, नूतन के साथ एक के बाद एक, इन सब मे से काला बाज़ार ही उस साल टॉप 10 की फेहरिस्त में जगह बना पाई थी, बाकी बम्बई का बाबू, जाली नोट, मंज़िल ने औसत व्यापार किया था, शेष फिल्में कुछ खास न कर पाई थी,

किशोर कुमार ने भी कुछ अच्छी फिल्में दी अपना हाथ जगन्नाथ,
अशोक कुमार ने कानून सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की फिर उन्होंने काला आदमी की ओर मासूम में कैमियो रोल किया था
फ़िल्म कानून का जिक्र किये बिना साल मुकम्मल नही होगा,,,,,क्योकि इस साल में सभी फिल्में म्यूजिकल हिट बन रही थी, गाने बॉलीवुड फिल्मों का अभिन्न अंग थे, लेकिन इस फ़िल्म कानून में एक भी गाना नही था, सस्पेंस- क्राइम- थ्रिलर, निर्देशक बी आर चोपड़ा ने फ़िल्म की आत्मा को देखते हुवे कोई गाना नही रखा गया था, यह प्रयोग फ़िल्म के साथ जोखिम लेने जैसा था परंतु फ़िल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई, आज भी बॉलीवुड के टॉप 10 लाइफ टाइम क्राइम थ्रिलर फिल्मों में जगह बनाई हुई है, अदाकारी से सजाया था फ़िल्म को राजेन्द्र कुमार, अशोक कुमार, नन्दा ने
राजेन्द्र कुमार ने कानून के अलावा पतंग फ़िल्म में भी काम किया था जिसमे माला सिन्हा भी थी, फिर उन्होंने मा बाप में काम किया,
मनोज कुमार ने इस साल महज़ एक फ़िल्म हनीमून की जिसमे उनकी साथी थी सय्यदा खान,
प्राण साहब ने कूल सात फिल्मों में अलग अलग चरित्र किरदार निभाए, जिस देश मे गंगा बहती है, छलिया, माँ-बाप, बेवकूफ, बसन्त, गैम्बलर, ट्रंक कॉल,

इधर अभिनेत्रियों में मधु बाला ने चार फिल्में मुग़ले आज़म, जाली नोट, बरसात की रात,महलों के ख्वाब उसी साल में की थी,
वहीदा रहमान ने चौदहवी का चांद, काला बाजार, एक फूल चार कांटे, गर्ल फ्रेंड की थी,
दक्षिण की पद्मिनी ने चार फिल्में जिस देश मे गंगा बहती है, कल्पना, बिंदिया, सिंगापुर, सरहद की थी,
नन्दा – कानून, आँचल, उसने कहा था, चांद मेरे आजा, अपना घर, जो हुवा भूल जा, काला बाज़ार जैसी फिल्में की थीं, फ़िल्म आँचल में उन्हें सर्वक्षेष्ठ सहायक अभिनेत्री का अवार्ड भी दिया गया था,
हेलन ने लगभग 20 फिल्मों में काम किया, हम हिंदुस्तानी में वह दूसरी मुख्य अभिनेत्री (सेकंड लीड) थी,
यह साल ने प्रतिभावान अभिनेताओं के आगमन से भी भरा पड़ा था, जिन्होंने भविष्य में खूब नाम कमाया था,
धर्मेंद्र – दिल भी तेरा हम भी तेरे से शुरूआत की थी,
जॉय मुखर्जी – लव इन शिमला
प्रेम चोपड़ा – मुड़ मुड़ के न देख
इंद्राणी मुखर्जी – उसने कहा था,
सुनील दत्त -हम हिंदुस्तानी से शुरूआत की
मनमोहन देसाई ने छलिया फ़िल्म से निर्देशन में कदम रखा,
गुलज़ार ने पहली बार फ़िल्म श्रीमान सत्यवादी के लिए गाने लिखे
साधना की मुख्य अभिनेत्री बतौर पहली फ़िल्म लव इन शिमला भी इसी साल आई थीं,
इस साल केअवार्ड की बात किये बिना बात मुकम्मल नही होगी, एक नज़र अवार्ड पर भी डाल लेते है,
सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म सम्मान मुग़ले आज़म,
सर्वश्रेष्ठ निर्देशक विमल रॉय फ़िल्म परख के लिए
सर्वश्रेष्ठ कहानी रूबी सेन को मासूम के लिए
सर्वश्रेष्ठ संगीतकार शंकर जयकिशन दिल अपना प्रीत पराई,
सर्वश्रेष्ठ गीतकार शकील बदायूं चौहदवीं का चांद गाने लिए,
सर्वश्रेष्ठ गायक मु रफी चौहदवीं का चांद गाने लिए,
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता दिलीप कुमार फ़िल्म कोहिनूर
सर्वश्रेष्ठ बिना रॉय फ़िल्म घूंघट के लिए
सहायक अभिनेता मोतीलाल फ़िल्म परख के लिए,
सहायक अभिनेत्री रही नन्दा फ़िल्म आँचल के लिए
सर्वश्रेष्ठ सँवाद और फिल्मांकन का अवार्ड गया मुग़ले आज़म के लिए,
उस साल विवाद के विषयों में अवार्ड्स भी चर्चा में बने हुवे थे क्योकि सर्वश्रेष्ठ निर्देशक विमल रॉय को एक औसत फ़िल्म के लिए ? जबकि के आसिफ ने सबसे बड़ी हिट मुग़ले आज़म दी थी,
इसी फिल्म के संगीतकार नोशाद ने ब्लॉकबस्टर संगीत रचा पर अवार्ड शंकर जयकिशन को ??दिल अपना और प्रीत पराई में महज़ एक गाना ” अजीब दास्ता है ये”” के अलावा कोई गाना दिल को नही छू पाया था, मुग़ले आज़म का हर गाना आज तक सदाबहार बना हुआ है, संगीत के लिए रोशन भी हो सकते थे जिन्होंने कव्वाली रची थीं,
घूंघट में बिना रॉय का काम अच्छा था लेकिन मधुबाला को नज़र अंदाज़ नही किया जा सकता था,
उस समय केवल पुरुष गायक को ही अवार्ड दिए जाते थे जिसमें मु रफी को मिला, लेकिन लता मंगेशकर को प्यार किया तो डरना क्या गाने पर विचार किया जा सकता था,
खैर यह तो चलता रहा है, और रहेगा भी,

यह थी साल 1960 की खासियत जो हमने संकलित कर आप तक पहुचाने की कोशिश की जिसमे कुछ फिल्मी मित्रों ने मदद की है, सबका नाम उल्लेख करना मुश्किल होगा, सधन्यवाद
मुम्बई फ़िल्म जगत की उस साल की फिल्मों की लगभग सभी बड़ी जानकारी आप तक पहुचाने की कोशिश की,
हो सकता है हम संकलन में कोई बड़ी फिल्म भूल गए हो तो आप हमें कमेंट्स कर के हमारा मार्गदर्शन कर सकते है

फ़िल्म समीक्षक
इदरीस खत्री

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