मुकद्दर!

ताजा एक वीडियो देखा। एक बंदा है, जिसके हाथ में पांच-पांच सौ के कई नोट हैं। वो उन नोटों को अपनी नाक और मुंह पर चिपकाकर कई बार इधर से उधर और उधर से इधर घुमाता है। फिर उन नोटों को कैमरे की तरफ करता है और घोषणा करता है, ‘ये अल्लाह का अजाब है !’
उसका इशारा समझे आप ? वो ये कहना चाहता है कि मैं कोरोना का मरीज हूँ। नोटों को इस तरह मैंने कोरोना वायरस का कैरियर कर दिया है और आगे ये नोट बाजार में चला दूंगा ! तुमसे बने जो उखाड़ लेना ! क्या ये कहने की जरूरत है कि उसके इरादे कितने शैतानी और भयावह है ? मुझे कहने दीजिए कि वो शख्स अपने गेटअप से और बोले गए एकमात्र वाक्य से मुसलमान मालूम होता है।
क्या इस वीडियो को फर्जी ठहराने का कोई तर्क है ? जवाब ये है कि कई हैं। एक ब्रम्हास्त्र जैसा तर्क ये है कि ये आरएसएस की साजिश है ! मुल्लों को बदनाम करने की। जरूरी नहीं कि ये तर्क कोई मुल्ला या मुसलमान ही पेश करे। जी हां, बेशुमार ‘हिन्दू’ भी, जो खुद को बकाया हिंदुओं (उसमें आप नॉन संघियों को भी शुमार कर लीजिए) से बेहतर मानते हैं, बड़े गर्व से ये ब्रम्हास्त्र जैसा तर्क पेश कर सकते हैं ! इस ब्रम्हास्त्र तर्क की तब तक कोई काट नहीं, जब तक कि वीडियो में मौजूद उस शख्स की असलियत स्थापित नहीं हो जाती। खैर।
एक और वीडियो है। इसमें कई पुलिस वाले एक गाड़ी में मुस्लिम दिखने वाले एक शख्स को पकड़कर ले जा रहे हैं। तभी ये शख्स गाड़ी में उसके सामने बैठे एक पुलिस जवान पर थूक देता है। इस वीडियो को आरएसएस का बताना थोड़ा मुश्किल है अलबत्ता मुमकिन है ये भी फर्जी करार दिया जाए। चलिए इसे भी छोड़ते हैं।
इधर, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉक्टरों और पुलिस वालों पर थूकने की घटना दिल्ली में भी हुई और इंदौर में भी। खबर ये भी है कि कोरोना के संदेही या सत्यापित जिन मरीजों को अस्पताल या कहीं और रखा जा रहा है तो वो वहां भी नर्सों के सामने नंगे हो रहे हैं और तमाम अभद्रता कर रहे हैं। जरा अचरज न कि लोगों के पास इसकी भी काट हो। जी हां, जैसे ये कि मीडिया, सॉरी गोदी मीडिया, आदतन हिन्दू-मुस्लिम करने के चलते मुसलमानों को लंबे समय से निशाने पर लिए हुए है !
गनीमत है इंदौर के टाटपट्टी बाखल वाले मामले में न आरएसएस निकला न गोदी मीडिया। ये और बात है कि उसी गोदी मीडिया ने उसी मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में साफ-सफाई की हैट्रिक लगाने वाले इसी इंदौर की बड़े जतन से कमाई अभूतपूर्व प्रतिष्ठा की पक्की पुंगी बजा दी है। खास गौर करने वाली बात ये है कि इंदौर की इसी घटना को लेकर अनेक मुस्लिम व्यथित हैं और शर्मिंदा हैं। फिर सम्भवतः पिछले छह साल में ये पहली मर्तबा है, जब यही मुस्लिम इस घटना को अंजाम देने वालों को जाहिल करार दे रहे हैं और सोशल मीडिया पर खुद होकर माफी भी मांग रहे हैं ! सच कहूं तो उनकी माफी ने इस नाचीज को भी द्रवित कर दिया है। सवाल ये है कि माफी मांगने की ये नौबत आई क्यों ?
अपन ने इस पर काफी विचार किया। पाया कि इसके बीज 2002 में डले थे। जी हां, जब गोधरा कांड के बाद गुजरात दंगों में जला था। वो बीज नफरत के बीज थे और नफरत के बीज डलने की वजह बने थे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ! हालांकि उसके बाद बारह बरस ये बीज अवचेतन की मिट्टी में दबे रहे। लेकिन 2014 में एक अलग आंधी चली। नतीजतन गुजरात के वही मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उस पर सवार होकर दिल्ली में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आ धंसे और बदले में कांग्रेस की सरकार तिनकों में तब्दील हो गई। अपनी जाती वजुहात से खुद को असली हिन्दू मानने वाले कांग्रेसी दिग्विजय सिंह जैसे बेशुमार कांग्रेस नेताओं और दीगर बेहतर ‘हिंदुओं’ के लिए ये अप्रत्याशित आघात था कि जिस पर 2002 में राजधर्म का पालन न करने का दाग था वो संसद के मंदिर की सीढ़ियों पर सगर्व शीश नवा रहा था और वो सब क्या, बल्कि कोई भी कुछ न कर पाया था। जाहिर है ये बेबसी और असहायता चुभने और कचोटने वाली थी। यही नहीं, वो 2019 में फिर, बल्कि ज्यादा ताकत से दोबारा प्रधानमंत्री चुना गया। अब ये तो जैसे जख्मों पर नमक रगड़ने जैसा था। जाहिर है राजनीति का तकाजा फिर ये था कि खुद की जड़े बचानी हो तो एकमात्र उपाय ये कि शत्रु की जड़ें खोदो। सो उन्हें याद आया कि उनके तुष्टिकरण का जिन्होंने भरपूर नमक डकारा है, उन्हें उनका फर्ज पूरा करने और उस नमक का कर्ज चुकाने का समय आ गया है। जड़ों में 2002 वाले नफरत के बीज पड़े ही थे। बस उन्होंने बड़े सलीके से उनको खाद-पानी देना शुरू कर दिया। संयोग से इसी दौरान मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक़, धारा 370, नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी जैसे प्रकल्प पेश कर दिए। जाहिर है नफरत के बीजों को हवा और धूप देने वाले साबित हुए ये। फिर कांग्रेस और बेहतर हिंदुओं ने मुसलमानों को उनका हितैषी बनकर उनको डराने का कोई मौका नहीं छोड़ा और नफरत के उन बीजों को पेड़ बनाने में दिन-रात एक कर दिया। कहने की बात नहीं कि नफरत अंधी होती है और करने वाले को अपना अच्छा-बुरा कुछ नहीं सूझता। उसे बस एक ही बात सूझती है कि उसे कैसे ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो, जिससे वो नफरत करते हैं।
आप देख लीजिए। कुल जमा आज यही कहानी है। आज जबकि पूरी दुनिया और देश एक महामारी की मार और मुहाने पर है तो मुस्लिम समुदाय का बड़ा तबका, जो पहले फिजूल ही सीएए के खिलाफ बुरी तरह अपनी भद पिटवा चुका था, अब कोरोना के मामले में खुद को जाहिल भी साबित कर चुका है। पूरे देश के सामने वो कितनी बुरी तरह एक्सपोज़ हो चुका है ये बताने की जरूरत नहीं। जमा दूसरों की उगाई नफरत के चक्कर में कौम का जो कबाड़ा किया सो अलग। सो जैसा ऊपर अर्ज किया कि गुज़श्ता छह साल में ये पहला मौका है, जब बेहतर मुसलमानों को बिना खुद की गलती के माफी मांगना पड़ी है। इसकी कुछ और वजहें भी हो सकती हैं, लेकिन अपनी निगाह में एक तो बराबर है। उसमें आप भले कांग्रेस या उसके नेताओं की गिनती करें या न करें आपकी मर्जी अलबत्ता एक वजह वो बेहतर ‘हिन्दू’ तो यकीनन हैं, जो बकाया हिंदुओं को गरियाते हैं और यूँ अपने आपको मुसलमानों का हितैषी जाहिर करते हैं। इनकी पहचान ये है कि ये कभी आपको आपकी खामियां नहीं बताते, न बताएंगे। ये सिर्फ आपकी नफरत को पोसते हैं। आप ठीक माने या गलत, ऐसा एक नाम आप जान लीजिए। ये है एनडीटीवी के रविश कुमार। इनको अपन मौलाना रविश कुमार कहते हैं।आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि इनमें और तबलीगी मरकज के स्वयंभू खलीफा मौलाना साद में ज्यादा फर्क नहीं है। ऐसे कई बेहतर ‘हिन्दू’ आपके आसपास भी ऐसे ही मौलाना की तरह मौजूद मिल जाएंगे। उनसे बचिए। नफरत किसी से भी हो, उसे थूक दीजिए और एक सशक्त भारत के लिए देश के साथ चलिए। तब आप माफी नहीं, बल्कि देश का आला मुकद्दर लिखेंगे।

लेखक :- चन्द्रशेखर शर्मा, पत्राकार,राज एक्स्प्रेस, इंदौर

ताजा एक वीडियो देखा। एक बंदा है, जिसके हाथ में पांच-पांच सौ के कई नोट हैं। वो उन नोटों को अपनी नाक और मुंह पर चिपकाकर कई बार इधर से उधर और उधर से इधर घुमाता है। फिर उन नोटों को कैमरे की तरफ करता है और घोषणा करता है, 'ये अल्लाह का अजाब है !' उसका इशारा समझे आप ? वो ये कहना चाहता है कि मैं कोरोना का मरीज हूँ। नोटों को इस तरह मैंने कोरोना वायरस का कैरियर कर दिया है और आगे ये नोट बाजार में चला दूंगा ! तुमसे बने जो उखाड़ लेना ! क्या…

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