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बोलना यदि गुनाह है तो लो कर डाला

पहले जमीर ने रोका तो मैं रुक गया। फिर दोस्तों, शुभचिंतकों ने मना किया तो मान गया। हमपेशा पत्रकार साथियों ने समझाया तो समझ गया। लेकिन, अब नहीं बोलूंगा तो अपराध बोध आ जायेगा। बात बहुत बड़ी नहीं है तो अनदेखी करने लायक भी नहीं । मसला शासन-प्रशासन से जुड़ा है। शुरुआत मेें मैंने भी माना और सबने कहा कि धीरे-धीरे सब कुछ व्यवस्थित हो जायेगा तो इंतजार करने लगा। अब लगता है, अब भी नहीं तो कब? जब सब कुछ खत्म हो जायेगा तब ? बात कोरोना काल में कुछ प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर है, जो बेवजह थोपी जा रही हैं। शुरुआत में सोचा कि इतनी बड़ा महामारी के लिये जब दुनिया के महारथी ही तैयार नहीं थे, तब हमारी क्या बिसात। बावजूद इसके हमने गजब की तत्परता, हौसला, ऐहतियात दिखाई और उसे लगभग काबू कर ही लिया है। अब यह समझ नहीं आ रहा कि जो इलाके जरा से भी प्रभावित नहीं हैं, वहां जीवन रोक देने की कोई तुक नहीं है। हिरोशिमा,नागासाकी और चेरनोबिल में भी जीवन इतना नहीं रुका था। चीन के उस शहर वुहान मेें ही नहीं रुका, जिसने इस कोरोना ड्रेगन को दुनिया को तबाह करने रवाना किया है। तब हमारे यहां पाबंदियों का पहाड़ लाद देना ऐसा ही है कि किसी को पता चले कि कोई मरने वाला है तो उसे सात तालों में या संदूक में बंद कर दो, फिर कहो कि अब मौत आकर बताये? अभी कहीं-कहीं कुछ ऐसा ही हो रहा है और इसे करने वाले यह मानकर चल रहे हैं कि इससे सब ठीक हो जायेगा। वे हम सबको भी ऐसा मानने को बाध्य कर रहे हैं। यह तो सरासर गलत है। जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसा है यह। कुछ पत्रकारों को व्यवस्थाओं के खिलाफ छापने,दिखाने पर धारा 144 में बंद करने की धौंस तक दी गई।

इसमें कोई दो राय नहीं कि आपदाकाल में सब कुछ असामान्य हो जाता है, दिनचर्या पूरी तरह से बदल जाती है। प्रथामिकतायें बदल जाती हैं, लेकिन यह सब एक प्रक्रिया के तहत होना चाहिये। जब इसे व्यक्तिगत मत से लागू किया जाये तो वह लोकतंत्र में पसंद नहीं किया जा सकता। जैसे 1975 के आपातकाल में रेलगाडिय़ां समय पर चलने लगी, दफ्तरों में समय पर काम होने लगे, फाइलें दौडऩे लगीं, भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया तो जनता को बुरा नहीं लगा, लेकिन जब विरोधियों को जेलों में डालकर प्रताडि़त किया जाने लगा, मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया, विपक्ष की आवाज बंद कर दी गई, मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी तो बात कैसे बिगड़ी, इतिहास गवाह है। वे जख्म अभी तक नहीं भरे जा सके।
बात शुरू करते हैं 25 मार्च से जब देश में ताला बंदी प्रारंभ हुई । तब तक पूरी दुनिया चपेट में आ चुकी थी और हम उतने प्रभावित नहीं हुए तो यह हमारी खुशकिस्मती है। ससमय तालाबंदी बेहद अच्छा कदम था। 22 मार्च के जनता कफ्र्यू के बाद जिस तरह से इसे लागू किया गया,मुझे लगता है कि सरकार में मानस बन गया था। यदि प्रशासन की कोई तैयारी नहीं थी, तब भी तालाबंदी लागू होने के एक हफ्ते के अंदर तो तैयार हो जाना चाहिये था। हम बात करते हैं इंदौर की, मप्र की । यहां के हालात अपेक्षाकृत ठीक नहीं, जो कि शुरुआती गफलत का परिणाम है। जैसे विदेश से देश में लोग आ गये , वैसे ही मप्र में, इंदौर में बाहर से लोग आ गये, हम रोक नहीं पाये। तब राजनीतिक प्रहसन चल रहा था। कांग्रेस सरकार बचाने में ,भाजपा पाने में लगी थी।

25 मार्च के बाद जो नहीं कर पाये, यहां उस पर ही बात हो रही है। प्रदेश में इंदौर में सबसे ज्यादा संक्रमित और मृत्यु का आंकड़ा बरकरार है। 3 मई के संदर्भ में बात करें तो 1500 सौ से अधिक संक्रमित , 76 मौतें हैं, जो प्रदेश का कमोबेश आधा आंकड़ा है। इसका क्या यह आशय है कि आप समूचे शहर को सवा महीने बाद भी काल कोठरी बना रहने दें और शहरवासी से कैदी या रोगी की तरह व्यवहार करें? चूंकि आप सवा महीने बाद भी व्यवस्था कायम नहीं कर पा रहे हैं तो सौ तालों की एक चाबी बना ली, संपूर्ण तालाबंदी। कोई घर से निकलेगा नहीं, संक्रमित होगा नहीं तो मौतें भी नहीं होंगी। रही बात जन सुविधाओं की तो उनकी बला से। व्यवस्थायें लादने वालों के घर तो भरे हुए हैं।

खुद दूध पीकर जनता से कहना कुछ दिन पानी न पीने से मौत नहीं हो जायेगी, यह हुक्मरानों का पुश्तैनी तेवर है। किसी ने कहा भी कि महीने-दो महीने सब्जी-दूध नही खाओगे तो मर नहीं जाओगे। सिद्धांतत: बिल्कुल ठीक है। इनसे जीवन नहीं रुकता, लेकिन ये एक व्यवस्था के तहत उपलब्ध करा भी दी जाये तो दिक्कत क्या है? दिक्कत यह है कि इनकी व्यवस्था करना आपके बस में नहीं और आप जिद करे बैठे हैं कि सामाजिक संस्थाओं को भागीदारी नहीं दी जायेगी, इसकी सब गड़बड़ है। जैसे ही तालाबंदी हुई , सबसे पहले सब कुछ बंद कर दिया गया। सब कुछ याने किराना,सब्जी और दूध भी ।

मैंने और शहर ने भी देखा है दूध की गाडिय़ों को दुकान के आगे से लौटाते हुए ,दूध के लिये खड़े हुए लोगों पर डंडे बरसाते हुए । वो भी उन इलाकों में जहां प्रारंभ से लेकर अभी तक एक भी संक्रमित नहीं है। कई बार गांवों से ही दूध गाडिय़ों को निकलने नहीं दिया गया। फिर सांची दुकानों से वितरण का प्रचार किया गया, जबकि उन दुकानदारों ने नियमित ग्राहकों के अलावा दूध देने से साफ मना कर दिया, क्योंकि उनके पास भी एक समय ही दूध आ रहा है। जो किराना दुकानदार प्रशासन की व्यवस्था से पहले घर पहुंच सेवा दे रहे थे, उनका कभी सामान जब्त कर लिया तो कभी डंडे के जोर पर दुकान ही बंद करवा दी। प्रशासन ने अप्रैल के पहले हफ्ते में किराना दुकानों की सूची तो बनाई, लेकिन नगर निगम की कचरा गाडिय़ों से उसे बंटवाना शुरू हुआ, 5 अप्रैल के बाद। एक दिन पर्ची दे गये, दूसरे दिन पर्ची वापस लेकर दुकानदार को दी और तीसरे या चौथे दिन उसने किराना घर आकर दिया या आपने पूछा तो बुलाकर दे दिया। इस तरह हो गई 10 अप्रैल। याने तालाबंदी के तालाबंदी के 15 दिन बाद जीवनोपयोगी किराना उपलब्ध कराया। और अफसरों ने क्या किया? उन्होंने रिलायंस फ्रेश, बेस्ट प्राइस, ऑनडोर जैसे बड़े-बड़े आउटलेट्स से अपने घर सामान बुलवा लिया। जब इन्हें जनता के लिये खोला गया तब इनके पास एक हफ्ते की प्रतीक्षा सूची थी या आप जाकर ला सकेें तो ठीक, लेकिन प्रशासन ने इसकी इजाजत भला कहां दी।

इतना ही समय दूध के नियमित रूप से घर पहुंचने में लगा। मैं यह मानता हूं कि लोगों ने पुलिस के कभी डंडे, कभी फटकार-दुत्कार खाकर दूध तो रोज ही प्राप्त किया, क्योंकि वह उसकी अनिवार्यता है। किराना दुकानों के जरिये घर पहुंच सब्जी वितरण का दिलासा तो प्रशासन तालाबंदी के पहले दिन से देने लगा, लेकिन इसे शुरू किया सवा महीने बाद 1 मई से, लेकिन पहले ही दिन इतनी सड़ी सब्जियां प्रदाय की कि दूसरे ही दिन प्रशासन ने सब्जी पैकिंग वाली जगह से 700 किलो भिंडी और 200 किलो बैंगन फिंकवाये, क्योंकि वे सड़े-गले थे। अब भी आप मानने को तैयार नहीं कि ये काम आपका है ही नहीं । क्यों नहीं इसे पूरी तरह से सामाजिक संगठनों को सौंप देते? आखिर क्या हेठी हो रही है? आप इन कामों में अपना वो तंत्र लगा रहे हैं, सामान्य दिनों में जिसकी विश्वसनीयता और निष्ठा संदिग्ध रहती है। फिर आपने सोचा कि जिस किसान ने दिसंबर, जनवरी में सब्जी बोई थी, जो मार्च, अप्रैल मेें तैयार हो गई थी, उसका क्या हुआ होगा? जनाब, वह सड़ गई। पशुओं को भी कितना खिलाते और मुफ्त में बांटने भी निकलते तो आपने निकलने नहीं दिया। शहर में कितने फल सड़े हैं, कुछ हिसाब है आपके पास? क्या सब्जी उत्पादकों, फल विक्रेताओं को उनके नुकसान की भरपाई कर रहे हैं आप? कर भी देंगे तो हमारी गाढ़े पसीने की कमाई से प्राप्त उस राजस्व से जिसे अपनी मनमर्जी वाले फैसले लादने की वजह से खर्च करने का हक आपको है ही नहीं ।

इंदौर भारत मेें ही नहीं,बल्कि दुनिया में अपने नमकीन कारोबार के लिये विख्यात है। हमने डेढ़ महीने से उसका भी गला दबा रखा है। जबकि बेहद आसानी से उसे चलाया जा सकता है। हालांकि इसके लिये भी आप कह सकते हो कि महीने, दो महीने नमकीन नहीं खाओगे तो मर नहीं जाओगे। इंदौरी तो नहीं मरेंगे, लेकिन इस कारोबार में सैकड़ों व्यापारी और उसमें लगे हजारों कारीगर बेहाल हुए जा रहे हैं। क्या आपकी चिंता इनकी सेहत बनाये रखने की नहीं है ? नमकीन का वितरण भी किराना दुकानों से उसी तरह से हो सकता है, जैसे किराना व सब्जी बंट रही है। बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और मॉल्स, किराना सेंटर्स से भी नमकीन बिकवाया जा सकता था। इनके पास जो भंडारण था, वह वैसा ही रखा हुआ है, जो कुछ करोड़ रुपये का तो है। खाद्य सामग्री अल्पजीवी होती है, लेकिन आप चिंता क्यों करें? आपके पास हर सवाल का एक ही जवाब है-लोगों की जान बचाना ज्यादा जरूरी है। बेशक, इतना अनाड़ी, नादान तो कोई नहीं,जो नमकीन खाने के लिये आपकी व्यवस्था को भंग करने से नहीं चूके, लेकिन कुछ लोगों की जान बचाने के लिये अनेक को मरने के लिये छोड़ देना भी तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। इंदौर में मोटे तौर पर रोजाना 300 टन नमकीन बनता है ,जिसमें से 75 टन की खपत इंदौर में होती है, ,बाकी बाहर चला जाता है।

आपने तालाबंदी लागू होते ही उन तमाम समाजसेवी लोगों से घरों में बैठ जाने को कहा, जो रोज कमाकर खाने वाले,संचय कर पाने की हैसियत न रखने वालों को थोड़ा बहुत सही, लेकिन राशन या तैयार भोजन पैकेट दे रहे थे। ये वो लोग थे, जो इंदौर शहर में परोपकार के पर्याय माने जाते हैं। ये सामाजिक संस्थायें, सेवाभावी, नि:स्वार्थ लोग बरसोबरस से वैसे भी मौके, बेमौके लंगर,भंडारे, राशन-पानी, दवा, कपड़े और नकद आदि से जरूरतमंद लोगों की मदद करते ही रहते हैं । ठेले पर सब्जी बेचने वाला, चाय,पोहे का खोमचा लगाने वाला, घरों में बर्तन-पोंछा करने वाली महिलायें, मंडियों में ठेले चलाने वाले, हम्माली करने वाले, फुटपाथ पर कपड़े, कटलरी बेचने वाले, साइकिल पर रोजमर्रा की दो-चार रुपये की चीजें बेचकर शाम में सौ-पचास रुपये कमा लेने वाला, नगर सेवा, ऑटो रिक्शा चलाने वाला, गैराज चलाने वाला, दुकानों,कारखानों, होटलों,रेस्टारेंट में दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले लोग लाखों की तादाद में इंदौर में हैं,जिन्हें तालाबंदी के दो-तीन दिन बाद ही आटे-दाल की कमी खलने लग गई थी। आपने तो मोहल्ले की किराना दुकान भी नहीं खोलने दी, जहां से वह नकद-उधार सामान ले सकता। जो चंद दुकानें खुल रही थीं, उनसे कुछ पुलिस वाले बाकायदा वसूली कर रहे थे। जो पुलिस वाले पत्थर और थूंक झेल रहे हैं, जो सडक़ पर रात-दिन गश्त कर रहे हैं, जो हॉट स्पॉट पर 24 घंटे ड्यूटी दे रहे हैं, जो घर जाकर भी बाहर से लौट आते हैं, वे अलग हैं और जो हर मौके पर वसूली को अपना जन्म सिंद्ध अधिकार समझते हैं वे पुलिस वाले अलग हैं। पर हैं तो सही।

आप बेवजह सख्ती वहां भी जारी रखे हुए हैं,जहां दूर तक सब कुछ अच्छा है। आपसेे सब्जी का वितरण शुरू नहीं हो पाया तो आपने ऑनलाइन वितरण करने वालों की भी सब्जी जब्त कर चिडिय़ा घर के हवाले कर दी, जहां के जानवरों द्वारा भी खाई न जा सकी। आपसे तब भी यह न हुआ कि गरीब बस्तियों में जाकर खुद बांट देते। उन भोजनशालाओं को दे देते जो नि:स्वार्थ सेवा जारी रखे हुए हैं। आपने जिन सामाजिक संगठनों, व्यक्तियों को मदद करने से रोक दिया, उन्हीं से राशन, भोजन पैकेट देने का आग्रह किया और उसे बंटवाने लगे नगर निगम के सफाईकर्मियों से ,दरोगाओं से । आपने कभी पता किया कि वह कितना, किसके यहां पहुंच रहा है, वो कौन से इलाके हैं, जहां यह राशन या भोजन पैकेट पहुंच रहा है? जब आप समाज से राशन-भोजन की मदद ले रहे हैं तो उनके स्वयंसेवकों को बांटने की इजाजत देने मेें क्या एतराज था? आज भी सारे लोगों तक सही मदद नहीं पहुंच रही है और कुछ लोगों ने वितरण का दो-दो महीने का राशन घर में जमा कर लिया है। भोजन पैकेट ले जाकर घर में, नाते-रिश्तेदारों में बांटे जा रहे हैं। पार्षद ले जाते हैं तो अपने वोटर, पट्ठों को दे देते हैं। जरा दस-बीस लोगों के घरों में तलाश कर तो देेखिये। वह तो कैलाश विजयवर्गीय, शंकर लालवानी,रमेश मैंदोला, संजय शुक्ला, उमेश शर्मा, अनिल भंडारी जैसी सेवाभावी शख्सियतेें हैं, जो अलग-अलग इलाकों में भोजनशालाओं से गरीब,भूखे का पेट भर रहे हैं, वरना..।

प्रशासन अव्वल तो एक मुश्त कोई योजना ही नहीं बना सका कि उसे पहले करना क्या है? बेहतर होता यदि शहर को चार-पांच हिस्सों में बांटकर योजना बनाई जाती, जो समग्र व्यवस्था संभालती। जैसे संक्रमण की जानकारी, उपचार की व्यवस्था, रोकथाम के प्रयास। फिर, किराना,दूध, सब्जी के वितरण का काम। सही मायनों में तो कोरोना की रोकथाम के अलावा प्रशासन को कोई काम करना ही नहीं था। शेष व्यवस्थाओंं के लिये समाज खुद जिम्मेदारी खुशी-खुशी ले लेता। इससे यह होता कि प्रशासन केवल कोरोना को रोकने पर केंद्रित होता तो नतीजे बेहतर होते। अभी-भी 15 दिन तक जांच रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है और जो लोग पॉजीटिव आये हैं, उनके दूसरे टेस्ट अभी-भी तत्काल नहीं हो पा रहे हैं। डेढ़ महीने बाद भी टेस्ट किट का अभाव बना हुआ है। ऐसे में आप कैसे उम्मीद करते हैं कि इसे 17 मई तक भी काबू में कर लेेंगे? इंदौर शहर में कमिश्नर, कलेक्टर, डीआईजी, एसपी स्तर के प्रत्येक कैडर के 4-5 अधिकारी हैं। इन्हें कोई जिम्मेदारी ही नहीं दी गई, जबकि ये भी शहर को जानते-समझते हैं और लंबा प्रशासनिक अनुभव भी है।

आप लोगों को शहर में आने-जाने नहीं दे रहे हैं। ऐसा इसलिये किया जा रहा है कि इसका विस्तार रोका जा सके, लेकिन एक माह बाद इस पर रोक ज्यादती की श्रेणी में आती है। अनेक लोग रिश्तेदारों के यहां रुके हैं। वे बोझ की तरह हैं, लेकिन दोनों कुछ नहीं कर सकते। कुछ बुजुर्ग लोगों का सहारा लोग दूसरी जगह अटके हैं। अनेक जगह बच्चे, माता-पिता अलग-अलग हैं। उनकी आर्थिक व्यवस्थायें सीमित होने से चरमरा चुकी हैं। दो घर का खर्च चलाना मुश्किल है, लेकिन आप सूई भी नहीं निकलने दे रहे। ऐसा तब हो रहा है जब वोट बैंक की खातिर आप कहीं दूसरे राज्य से मजदूरों को ला रहे हैं। आप रसूखदारों के बच्चों को कोटा की कोचिंग क्लासेस से निकालकर ला रहे हैं। किंतु जो व्यक्ति एकाकीपन के चलते, दूसरे के घर टिके रहने के कारण, अपनों से दूर रहने के कारण अटका है, उसकी परवाह नही है। वह भी तब जब उसे मप्र के भीतर ही सौ-दो सौ किलोमीटर के दायरे में ही आना-जाना है। यह भी गैर जरूरी और ज्यादती है। जो लोग निजी वाहनों से आसानी से एक से दूसरी जगह जा सकते हैं,जिनकी प्राथमिक जांच आसानी से हो सकती है, उन्हें रोककर रखना याने अपनी खामी को ढंकना ही है।

आपने शासकीय महकमों में कुछ कर्मचारियों का आना-जाना प्रारंभ किया है। ये लोग वहां क्या करेंगे, जब तक संबंधित लोगों को वहां जाने नहीं दिया जायेगा? ई पास बनाने के लिये आपको लगता है कि हर व्यक्ति के पास मोबाइल है, उसमें बैलेंस है, उसे इंटरनेट चलाना आता है,आपका सर्वर डाउवन हो जाये तो उससे निपटेगा कैसे? क्या मप्र ऑनलाइन सेंटर शुरू नहीं कर सकते थे? क्या जिस तरह से सरकारी दफ्तर शुरू किये गये, वैसे ही कुछ निजी दफ्तर शुरू नहीं किये जा सकते? क्या सीमित तादाद में उन्हें अनुमति नहीं दी जा सकती? आपने कभी सोचा है कि दो माह तक सारे दफ्तर बंद रहने से लंबित काम कितना बढ़ जायेगा, जिसे करने में संबंधित कर्मचारी को रात-दिन लगना पड़ेगा? पहले आपने लोगों को कैशलेस की घुट्टी पिलाई, फिर उसे डेढ़ महीने तक बैंकों की ड्योढ़ी नहीं चढऩे दी, वाह। बैंकों को पूरी तरह बंद रखकर आप कैसे देश में कामकाज के सुचारू रूप से चलने की उम्मीद कर सकते हैं? जो किराना, दवा व्यापारी काम कर रहे हैं,वे सामान के लेनदेन को बिना बैंक के क्या नकद में करेंगे? खासकर वे बाहरी राज्य या शहर से नकद सामान बुलवा सकते हैं?

आखिरी जरूरी बात। लंबे समय तक घरों में रहने से, वे ही चेहरे देखने से, एक-सी दिनचर्या से तनाव,अवसाद,कुण्ठा पैदा होता है, इस बारे में वैज्ञानिकों, मनो चिकित्सकों, आध्यात्मिक सलाहकारों से कभी समझा क्या? इस नुकसान की भरपाई
कैसे कर पायेेंगे?

रमण रावल

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