घर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनी रसोई क्यों देती है समस्याओं को जन्म

घर में सबसे महत्‍वपूर्ण होती है रसोई। यदि रसोई वास्तु शास्त्र के अनुसार सही दिशा में बनी हो तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। जीवन में तीन आवश्यकताएँ महत्त्वपूर्ण होती है रोटी, कपड़ा और मकान। आवासीय मकान में सबसे मुख्य घर होता है रसोईघर। इसी दिशा में अग्नि अर्थात ऊर्जा का वास होता है। इसी ऊर्जा के सहारे हम सभी अपनी जीवन यात्रा मृत्युपर्यन्त तय करते है । अतः इस स्थान का महत्त्व कितना है आप समझ सकते है। कहा जाता है कि व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं धन-सम्पदा दोनो को रसोईघर प्रभावित करता है। अतः वास्तुशास्त्र के अनुसार ही रसोईघर बनाना चाहिए।वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कई बार ऐसा देखा गया है कि घर में रसोईघर गृहिणी के अनुरूप बना हुआ है फिर भी रसोईघर में खाना बनाकर ही खुश नही होती है या खाना बनाने के बाद उसमे कोई बरकत नहीं होता है बल्कि घट जाता है । उसका मुख्य कारण है रसोईघर का वास्तु सम्मत नहीं होना अर्थात वास्तुदोष का होना।

भवन के दक्षिण-पूरब दिशा अर्थात् आग्नेयकोण में किचन यानी रसोईघर तथा पश्चिम दिशा में ‘डाइनिंग हाल’ अर्थात् भोजनकक्ष का निर्माण करना चाहिए। इससे एक ओर जहाँ स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होता है, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक सदस्यों का मन-मस्तिष्क संतुलित रहता है और वे स्वस्थ बने रहते हैं तथा प्रगति करते हैं। भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने और उत्तम भोजन निर्माण के लिए रसोईघर का स्थान घर में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यदि हम भोजन अच्छा करते हैं तो हमारा दिन भी अच्छा गुजरता है। यदि रसोई कक्ष का निर्माण सही दिशा में नहीं किया गया है तो परिवार के सदस्यों को भोजन से पाचन संबंधी अनेक बीमारियां हो सकती हैं।

भवन में रसोईघर के लिए सबसे उपयुक्त स्थान आग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्वी दिशा है, जो कि अग्नि का स्थान होता है। दक्षिण-पूर्व दिशा के बाद दूसरी वरीयता का उपयुक्त स्थान उत्तर-पश्चिम दिशा है।वास्तु के विपरित बनायी गयी रसोई किचिन-एक्सीडेन्ट को तो बढ़ावा देती ही है साथ ही अनचाहे मेहमानों की संख्या में भी बढ़ोतरी करती है. वास्तु के अनुसार अपने रसोई घर में पानी का मटका, गैस आदि को सही स्थान पर रखना चाहिए. इन्हे सही स्थान पर ना रखने से पेट संबंधी बीमारियाँ व तनाव से ग्रसित होने की संभावनाएँ रहती हैं. वास्तु के अनुसार हमारे किचन में कौन सी वस्तु कहा पर होनी चाहिए और हमारे किचन की दिशा किस तरफ हो इसके लिए आइये जानते है |

इस संदर्भ में वास्तुविद्या विशारदों ने कहा भी है-

पाकशाला अग्निकोणे स्यात्सुस्वादुभोजनाप्तये” अर्थात् दक्षिण-पूर्व दिशा में रसोईघर बनाने से स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होता है।

मनमाने ढंग से रसोई घर जिस-तिस दिशा में निर्मित करा लेने से शारीरिक-मानसिक परेशानियों, आर्थिक संकटों एवं पारिवारिक कलह-क्लेशों का सामना करना पड़ता है।वस्तुतः यह तथ्य भी है कि घर का संतुलन रसोईकक्ष के माहौल तथा परिस्थिति पर निर्भर करता है। व्यक्ति के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य एवं पारिवारिक सौमनस्य का तानाबाना रसोईकक्ष में ही बुना जाता है। वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की अन्न का मन पर पड़ने वाले प्रभाव या ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन’ की उक्ति जहाँ एक सच्चाई है, वहीं इसमें इतनी बात और जोड़ लेनी चाहिए कि भोजन किस मनःस्थिति एवं परिस्थिति में तथा किस दिशा में बनाया गया है। इसका भला-बुरा प्रभाव भी खाने वाले पर पड़े बिना नहीं रहता। घर की सुख-शाँति एवं समृद्धि का बहुत कुछ संबंध रसोईकक्ष से जुड़ा हुआ है।महिलाओं का अधिकतम समय किचन में ही बीतता है। वास्तुशास्त्रियों के मुताबिक यदि वास्तु सही न हो तो उसका विपरीत प्रभाव महिला पर, घर पर भी पड़ता है। किचन बनवाते समय इन बातों पर गौर करें।

किचन की ऊँचाई 10 से 11 फीट होनी चाहिए और गर्म हवा निकलने के लिए वेंटीलेटर होना चाहिए। यदि 4-5 फीट में किचन की ऊँचाई हो तो महिलाओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कभी भी किचन से लगा हुआ कोई जल स्त्रोत नहीं होना चाहिए। किचन के बाजू में बोर, कुआँ, बाथरूम बनवाना अवाइड करें, सिर्फ वाशिंग स्पेस दे सकते हैं।

रसोईघर (Kitchen) आग्नेय अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा ( South-East ) में ही होना चाहिए। इस दिशा का स्वामी अग्नि ( आग ) है तथा इस दिशा का स्वामी ग्रह शुक्र होता है। आग्नेय कोण में अग्नि का वास होने से रसोईघर तथा सभी अग्नि कार्य के लिए यह दिशा निर्धारित किया गया है। यदि आपका किचन इस स्थान पर तो सकारत्मक ऊर्जा ( Positive Energy ) का प्रवाह घर के सभी सदस्यों को मिलता है।

वास्‍तु के अनुसार रसोई के नियम और फायदे

  • वास्तु सिद्धांत बताते हैं की रसोई के लिए घर का आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्वी दिशा वास्तु के अनुसार सर्वोत्तम रहती है। घर के आग्नेय कोण में स्थित रसोई सुख एवं स्वास्थ्य का कारक होती है। जबकि पूर्व दिशा तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा में बनी रसोई समस्याओं को जन्म देती है।
  • यदि आग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्व दिशा में रसोईघर की स्थापना सम्भव न हो तो इसे उत्तर-पश्चिमी दिशा वाले भाग में भी बनाया जा सकता है, लेकिन यह ध्यान रहे कि यदि दक्षिण-पूर्व दिशा के बजाय रसोई किसी अन्य दिशा में बनाई जा रही है तो खाना पकाने की स्लैब दक्षिण-पूर्वी कोने में ही बनाया जाए।
  • किचन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्लेटफार्म हमेशा पूर्व में होना चाहिए और ईशान कोण में सिंक व अग्नि कोण चूल्हा लगाना चाहिए।
  • किचन के दक्षिण में कभी भी कोई दरवाजा या खिड़की नहीं होने चाहिए। खिड़की पूर्व की ओर में ही रखें।
  • रंग का चयन करते समय भी विशेष ध्यान रखें। महिलाओं की कुंडली के आधार पर रंग का चयन करना चाहिए।
  • किचन में कभी भी ग्रेनाइट का फ्लोर या प्लेटफार्म नहीं बनवाना चाहिए और न ही मीरर जैसी कोई चीज होनी चाहिए, क्योंकि इससे विपरित प्रभाव पड़ता है और घर में कलह की स्थिति बढ़ती है।
  • नैऋत्य कोण में रसोईघर बनवाने से आर्थिक हानि तथा घर में छोटी-छोटी समस्या बढ़ जाती है। यही नहीं घर के कोई एक सदस्य या गृहिणी शारीरिक और मानसिक रोग ( Mental disease ) के शिकार भी हो सकते है। दिवा स्वप्न बढ़ जाता है और इसके कारण गृह क्लेश और दुर्घटना की सम्भावना भी बढ़ जाती है।

नोट:– उपर्युक्त बताये गए नियम के अनुसार अपने रसोई का वास्तु विचार करे रसोईघर बनाये। यदि किसी कारणवश आप अग्निकोण में रसोईघर नहीं बना सकते तो आप जिस भी स्थान में रसोईघर बनाये है उसी स्थान विशेष पर अग्निकोण का चयन करके नियमानुसार सभी समान को स्थापित कर देना चाहिए।

यदि वायव्य कोण में आपका रसोईघर है तो उस कक्ष के अग्नि कोण दक्षिण पूर्व दिशा में स्लैब बनाकर पूर्वी दीवार के पास गैस चूल्हा रखना चाहिए। इससे बनाने वाली का मुख भी पूर्व दिशा मे हो जाएगा जो कि वास्तु के अनुसार होगा। इसी प्रकार अन्य सामान को रखना चाहिए।

इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं तथा इन्हें अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेगा। इन्हें अपनाने से पहले वास्तु विशेषज्ञ वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री की सलाह जरूर लें।

पंडित “विशाल” दयानन्द शास्त्री,
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्

घर में सबसे महत्‍वपूर्ण होती है रसोई। यदि रसोई वास्तु शास्त्र के अनुसार सही दिशा में बनी हो तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। जीवन में तीन आवश्यकताएँ महत्त्वपूर्ण होती है रोटी, कपड़ा और मकान। आवासीय मकान में सबसे मुख्य घर होता है रसोईघर। इसी दिशा में अग्नि अर्थात ऊर्जा का वास होता है। इसी ऊर्जा के सहारे हम सभी अपनी जीवन यात्रा मृत्युपर्यन्त तय करते है । अतः इस स्थान का महत्त्व कितना है आप समझ सकते है। कहा जाता है कि व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं धन-सम्पदा दोनो को रसोईघर प्रभावित करता है। अतः वास्तुशास्त्र के अनुसार…

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