शकुंतला देवी

गणित का बुखार उतार देने वाली देवी….

निर्देशक :- अनु मेनन
अदाकार :- विद्या बालन, सान्या मल्होत्रा, जिशू सेनगुप्ता, अमित साध,
लॉकडाउन के चलते फ़िल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित हुई है,,
फ़िल्म से पहले एक चर्चा :-
फ़िल्म के शुरूआत में एक घोषणा आती हैं कि यह फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित हैं, फिल्मकार ने कल्पना शीलता एक नाटकीयता का प्रयोग भी किया है, रचनात्मकता के लिए सच्ची घटनाओं से जोड़ा गया है,
इस घोषणा ने मन दुखी और व्यथित कर दिया अब जो रोमांच था बायोग्राफी का वह मेरे अंतर्चेतना से लगभग समाप्त से हो गया
एक उदाहरण से आप समझ जाएगे
शहंशाह अकबर- सलीम – अनारकली इसमें अकबर सलीम तो सच्ची घटना थे लेकिन अनारकली का कोई वजूद इतिहास में नही मिलता हैं, रानी पद्मावती भी संयोगवश इसी में आती है, दोनो विषय विवादित भी है लेकिन कल्पना भी ??
फ़िल्म पर आते है:-
गणित तीन हर्फों(अक्षरों) का यह लब्ज़(शब्द) आज पढ़ाई मुकम्मल कर लेने के बाद भी मुझे बचपन से आज तक किसी भूत की मानिंद ही लगा है आज तक भी इस लब्ज़ के डर से जूझ ही रहे है यह हालत दुनिया के लगभग 70%लोगो की है, MATHS को हम दोस्त (मेरी आत्मा तुम्हे हमेशा सताएगी) से भी लेते थे
और एक ऐसी महिला जो कि गणित के मुश्किल से मुश्किल सवालात का हल चुटकियों में निकाल दे तो वह तो सुपर कम्प्यूटर की तरह ही होंगी इन्ही महिला की ज़िंदगी से प्रेरित होकर फ़िल्म बनाई गई है
शकुन्तला देवी गणितज्ञ के जीवन के कुछ पहलुओं को छूते हुवे फ़िल्म निर्माण किया गया है यह महिला गणित के नाम से भागती नही थी वरन गणित से को अपने चरण स्पर्श या मथ्था टेकने को मजबूर कर देती है,
लेकिन इसे दंगल, मिल्खा, राजी, तलवार की श्रेणी में नही रखा जा सकता ,,,
इस पंक्ति पर चर्चा इसी आलेख के अंत मे करूँगा
कहानी :-
एक बालिका जो न तो स्कूल गई न गुरुकुल, न मदरसे लेकिन वह अपनी एक जन्मजात प्रतिभा के चलते गणित के मुश्किल से मुश्किल सवालों के जवाब चुटकी बजाते निकाल देती है, एक ऐसी प्रतिभा उस बालिका को छोटे से गाँव से निकालकर देश और विदेशों तक मे ख्यात और प्रख्यात बना देता है, और विदेशों में बेठे बड़े बड़े गणितज्ञों को सिर खुजाने को मज़दूर कर देता है,
एक ऐसी महिला ज़ब भी घर गृहस्ती के जंजाल में फंसती हैं तो वह अपनी प्रतिभा के साथ परिवारिक जिम्मेदारी को कैसे सम्भालती है यह भी फ़िल्म फ़िल्म का हिस्सा बनाया गया है, खुद के जिस्म का एक हिस्सा उनकी बेटी या गणित की पहेलियां शकुन्तला देवी इनके बीच मे एक भंवर में फंस जाती है,
शकुन्तला देवी अपनी प्रतिभा के चलते आर्यभट्ट और एल्बर्ट आइंस्टीन के समकक्ष उन्हें खड़ा कर पूरे देश को गौरवान्वित करती है,
तरक्की और उरूज का नशा भी फ़िल्म में दिखाया गया हैं,
समलैंगिग सम्बन्धों की तरफ भी फ़िल्म ले गई हैं,
दूसरे भाग में फ़िल्म गणित से दूर होकर मा बेटी के रिश्ते में डूबती दिखी, यह भाग टीवी धारावाहिकों की याद ताजा करता है,
लेकिन जब कोई इंसान गृहस्ती के सवालों में उलझता है तो ज़िन्दगी के अनबूझे सवाल कई बार आपसे आपकी प्रतिभा को किनारे कर देते है
एक मुकाबला शकुन्तला देवी और सुपर कम्प्यूटर से कराया जाता है
जिसमे कौन जीतता है यह जानने के लिये फ़िल्म देखी जा सकती है,
और हा गणित के जिन्न या भुत को भगाने के लिए भी फ़िल्म देखी जा सकती हैं,
अदाकारी :-
विद्या बालन ने जिस दृणता से किरदार पिरोया है वह काबिले एहतराम है थोङा घुस्सा, थोड़ा अहंकार, थोड़ा अपनापन थोड़ा प्यार बड़ी ईमानदारी से किरदार में डाले है जिसके पूरे 100 नम्बर विद्या कोदिए जा सकते है,
उनकी बेटी के किरदार सान्या मल्होत्रा भी अच्छा काम कर गई है उनकी एभिनय उड़ान अभी बाकी है, लेकिन विद्या के सामने होते हुवे भी उन्होंने अपनी एभिनय क्षमताओं को सिद्ध किया है ,
अमित साध किरदार छोटा परन्तु इंसाफ पूरा पूरा किया गया है (एक वक्त में अमित ने भी उन हालातो का सामना किया था जिनको सुशांत राजपूत सहन नही कर पाए थे इंडस्ट्री में काम न मिलने की धमकियों जैसे हालातो से पार होकर अमित आज भी खड़े है,
जिशू सेनगुप्ता ने बड़ी सहजता और संजीदगी से विद्या के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर गए है,
सिवा चड्ढा और इटालियन अभिनेत्री लूबा कलवानी आपको अचंभित कर सकते है
गीत संगीत
सचिन जिगर का संगीत है गानेके नाम पर इक्का दुक्के गाने है जो फ़िल्म के साथ घुले मिले हुवे हैं फ़िल्म को आगे बढ़ाते हैं, गाना पास नही तो फैल नही अच्छा बना है फ़िल्म के बाद भी गूंजता है आपके कानो में
बायोग्राफी से खिलवाड़ ????
पान सिंह तोमर, दंगल, तलवार, दंगल, मिल्खा, सुपर 30 बायोग्राफी थी लेकिन इस फ़िल्म में कुछ हिस्से शकुन्तला देवी की ज़िंदगी से लिये गए है जो कि खटकने लगता है
बार बार मन मे यह सवाल आता है कि यह दृश्य सच है या कल्पना तो फ़िल्म का रिदम टूटता बिखरता लगता है,
दो मुख्य घटनाएं जो फ़िल्म में नही ली :-
एक एलबर्ट आइंस्टाइन से मुलाक़ात और जिस गणित के सवाल को एलबर्ट तीन घण्टे में करते थे शकुन्तला देवी कम समय मे कर देती है उसे नही दिखाया गया,
दूसरा कनाडा यात्रा के दौरान दो पुरुष अंग्रेज मित्रों के घर पर खाना खाते हुवे खाने की तारीफ करने जिस पर पता चलना एक अंग्रेज का यह कहना कि खाना मैं बनाया फिर शकुंतला देवी का जवाब की आप दोनों मर्दों को शादी कर लेना चाहिए समलैंगिकता की तरफ इशारा था फ़िल्म में नही दिखाया गया जो कि अखरता है,,,,
फ़िल्म क्यो देखे :-
गणित के जिन्न या भुत को भगाने के लिए भी फ़िल्म देखी जा सकती हैं,
पारिवारिक रिश्तों के टूटते बिखराव को समझने के लिए देखी जा सकती हैं
एक महिला जो भारत का परचम दुनियाभर में फहराई हो
पारिवारिक फ़िल्म है

स्टार्स
3.5

फ़िल्म समीक्षक
इदरीस खत्री

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