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Tag Archives: Jyotsna Saxena

फिर याद आ गए तुम

तारों के झिलमिलाते आँगन में अम्बर के अंतहीन ह्रदय में अंकित पूर्णिमा का चाँद देखते ही एक बार फिर याद आ गए तुम —- युगल पंछियों का नीड़ की ओर बढ़ना देख धरा की प्यास श्यामल पावसों का उमड़ना मुखरित हुआ अनूठा एहसास प्रतीक्षारत साँझ में एक बार फिर याद आ गए तुम —- चाँद की लरजती खूबसूरती में मुग्ध ...

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मेरे अश्क़

मेरे अश्क़ !! बातूनी हैं बहुत तन्हाइयों में सखियों सी बेहिसाब बातें करते हैं—- मेरे अश्क़ !! हताशा का रुख मोड़ अपनेपन से मुस्कुराकर मिलते हैं—- मेरे अश्क़ !! पारदर्शी मोती के वलय में खुशियों के सतरंगी रंग भरते हैं—– मेरे अश्क़ !! ख़्वाबों को लड़ियों में पिरोकर मन को समझाते हैं मेरे अश्क़ !! भीगे बादल से कभी भोली ...

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सिर्फ तुम थे

दर्पण से आज बातें की बेहिसाब तुम्हारे प्रतिबिम्ब को मुस्काने दीं बेहिसाब प्रतीक्षा भरे दृगों में तुम ही थे …. सिर्फ तुम ही थे आंजन की सलाई से भरा सावन के मेघों सा चाहत का विश्वास भोर की चटकती उम्मीद में लालिमा में , तबस्सुम में तुम ही थे …. सिर्फ तुम ही थे रुखसार पे सिमट आई शर्मीली सी ...

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बसंत रुत आई

मेड़ों की पीली सरसों खेतों की भीगी माटी हरी हरी अमराइयाँ आई ,,, आई ,,, बसंत रुत आई पत्तों से छन छनकर आती उमंगों की घाम पिघलती हुई अनुभूतियाँ आई ,,, आई ,,, बसंत रुत आई मधुप की मकरंद चाह फूलों की हवा संग ठिठोली कोयलिया की शब्दलहरियां आई ,,, आई ,,, बसंत रुत आई लबों पे लाज भरी मुस्कान ...

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