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मॉं

Dr Manisha Sharma

मॉं है ईश्वर की इबादत मॉं है प्रेम की ईबारत मॉं है मन में श्रद्धा का भाव मॉं है धूप में गुलमोहर की छॉंव मॉं है अपनत्व की सेज मॉं है सूरज का तेज मॉं है ममता का सागर मॉं है खुशियों की गागर मॉं है शीतल सी चॉंदनी मॉं है सुरो की रागिनी मॉं है दीपों का पर्व मॉं ...

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एक छोटा सा बच्चा अपनी स्वर्गीय माँ से कहता हुआ

कहाँ जा रही हो छोड़ कर राह मेँ मुझे इस तरह माँ अभी तक तो मैँने चलना भी नही सीखा अरे मुरझाया हुआ फूल हूँ मै तो अभी तक तो मैँने खिलना भी नही सीखा खेल खेल मेँ गिर जाऊ तो कौन साहारा देगा मुझे मैने तो अभी उछलना भी नही सीखा चल दी हो तुम कहाँ अकेला कर के ...

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मां मुझे डर लगता है

मां मुझे डर लगता है . . . . बहुत डर लगता है . . . . सूरज की रौशनी आग सी लगती है . . . . पानी की बुँदे भी तेजाब सी लगती हैं . . . . मां हवा में भी जहर सा घुला लगता है . . . . मां मुझे छुपा ले बहुत डर लगता है . . . . मां याद है वो काँच ...

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माँ तो माँ है

माँ तो माँ है ‘माँ’ जिसकी कोई परिभाषा नहीं, जिसकी कोई सीमा नहीं, जो मेरे लिए भगवान से भी बढ़कर है जो मेरे दुख से दुखी हो जाती है और मेरी खुशी को अपना सबसे बड़ा सुख समझती है जिसकी छाया में मैं अपने आप को महफूज़ समझती हूँ, जो मेरा आदर्श है जिसकी ममता और प्यार भरा आँचल मुझे ...

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माँ का गीला बिछौना

कुछ भूल से गए हो तुम माँ का गीला बिछौना तुम्हारा सुख से सूखे में सोना नींद से उठकर तुम्हे कम्बल में ढंकना क्या केवल फ़र्ज़ था उनका पापा के कंधे पर बैठ .. दुनिया की सैर करना क्या तुम सच भूल गए हो.. ”पाटी पूजा” कर लिखा स्लेट पर ”अ” से अनार पहली पाठशाला को भूल पाओगे तुम.. गुरु ...

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लाचार माँ

” खून की कमी से रोज मरती, बेबस लाचार माँ ” माँ की दवाई का खर्चा, उसे मज़बूरी लगता है उसे सिगरेट का धुंआ, जरुरी लगता है || फिजूल में रबड़ता , दोस्तों के साथ इधर-उधर बगल के कमरे में, माँ से मिलना , मीलों की दुरी लगता है || वो घंटों लगा रहता है, फेसबुक पे अजनबियों से बतियाने ...

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दादी माँ

मेरे मन की, पिता के मन की, सारे भावों को जान लेती है। ज़िन्दगी को मुद्दत से देखती आई है, हर दुख-दर्द को सहती आई है। अपने ऊपर हर कष्ट लेकर, आँचल का छाँव देती आई है॥ मेरी दादी माँ, मेरे और मेरे पिता के, संग संग हर पल, हर वक़्त रहती है॥

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माँ तुझे मै क्या दूँ

ऐ माँ तुम्हे मै क्या दू… तन समर्पित मन समर्पित, जीवन का हर छन समर्पित सोचता हु ऐ माँ तुझे और क्या दूँ … छीर सिन्धु के तेरे अमृत ने, पोषित किया मेरा ये जीवन तेरे आँचल से महंगा कोइ वस्त्र नहीं, ढक ले जो सारा तन तेरे ममता के सागर सा, प्यार नहीं पाया कभी ये मन त्याग रत्न ...

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