साबुन की अडतालीस टिकिया

आप बड़े उत्साह से प्रातःकाल उठकर अपनी शारीरिक शुद्धि करते हो। फिर उससे दिन भर बद्‌बू न आये, इसलिये पाउडर आदि लगाते हो जिससे कुछ समय के लिये ही सही, आपके अंदर भरी पसीने आदि की बदबू से आप एवं आप के संगी-साथी बच सकें।

कभी आपने सोचा है कि इतनी शुद्धि के बाद भी यह बदबू तत्काल कैसे और क्यों पैदा हो जाती है। इसका कारण आपका ही यह प्रिय शरीर है जो मल, मांस, मूत्र, विष्टा एवं लहू का ढेर है। आपको यह जो बदबू और गंदगी दिखाई दे रही है, वह तो बाहर की स्थूल ही है, जो मक्खी के पंखों से भी पतले चमड़े के आवरण से ढकी हुई है, अतः आपको पता नहीं चल पता है कि आप के शरीर की जो आंतरिक गंदगी है, वह आपकी कल्पना से भी बहुत-बहुत ज्यादा है.

अब अगर कोई कहे कि वर्तमान में आप कर्म रूपी मांस, मूत्र, विष्टा और कीचड़ के पहाड़ पर बैठे हो और अभी आप का यह दुर्भाग्य है कि आपको उसकी बदबू भी नहीं आ रही है, तो क्या आप इस बात को मान सकते हो?

वास्तव में तो चौरासी लाख योनियों में से प्राप्त यह मनुष्य भव रूपी पुण्य तो सिर्फ एक साबुन की टिकिया के समान है, जिससे अगर आप चाहो तो इस कर्म-कीचड़ की धुलाई भक्ति, पूजा, व्रत, तप, नियम संयम आदि से करके इसे कुछ कम करने की कोशिश कर सकते हो। परन्तु जहाँ पर मिथ्यात्व रूपी अनन्त गंदगी फैली है, वहाँ आप बचकर कहाँ पर जाओगे? दुबारा मनुष्य भव भी पा लोगे, तो भी अधिक से अधिक 48 मनुष्य भव ही पा सकोगे। इनमें भी 16 पुल्लिंग, 16 स्त्री लिंग और 16 नपुंसक लिंग के होते हैं. तब फिर आपका आगे क्या होगा? आप को फिर से एकेन्द्रिय-निगोद पर्याय में अनन्तकाल के लिये जाना पड़ेगा क्योकि तब तक आप की त्रस की आयु ही खत्म हो जावेगी।

देखो भाई साबुन की टिकिया तो सफाई के कार्य में आती है, पर वो टिकिया कितने दिन चलती है? अरे जहाँ पर गंदगी असीम है, वहाँ यह छोटी सी टिकिया भी शीघ्र ही समाप्त हो जाती है । अगर आपके पास पैसे होंगे तो आप दूसरी टिकिया खरीद लोगे पर कब तक? केवली भगवंत देख रहे हैं कि किसी के पास भी अधिक से अधिक 48 टिकिया खरीदने के ही पैसे जमा हो सकते हैं। उसके बाद तो अनन्तकाल सांसारिक गंदगी में ही लिप्त रहना पड़ेगा। अतः सांसारिक गंदगी से दूर हो जाना ही एकमात्र साफ-सुथरे रहने का तरीका है। इसलिये अब इस शरीर का एक ही फायदा हो सकता है कि यह शरीर आप के चैतन्य परमात्मा की प्राप्ति में आपका सहायक बने। अतः इस शरीर को अपना सहायक (दास) बनाओ। खुद उसके दास मत बनो।

इसके बाद इस गंदगी को दूर करने का तरीका यह हो सकता है कि आप गंदगी के ढेर रूपी इस संसार से मोह ममत्व तोड़कर अपनी आत्मा में लगन लगा लें। फिर जब यह संसार ही आप में नहीं होगा तो उसकी गंदगी आप में कैसे प्रवेश कर सकेगी? आज तक आप ने अपनी भूलवश इस संसार को आश्रय दिया है, इसलिये तो इस गंदगी को भी आश्रय मिल गया। अब आगे से जब आप इस संसार का लोप करते हो, तो यह गंदगी भी आश्रय-हीन होने से स्वतः ही नष्ट हो जावेगी और फिर अनन्तकाल के लिये आप के आत्मा की सुगन्ध से तीनों लोक महक उठेंगे।

Dr. Swatantra Jain

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