साल 1960 बॉलीवुड में एक खास – भाग 1

वेसे तो मुम्बई सिनेमा का अब हर साल खास होता है, लेकिन 1960 का साल एक खास वजूद के साथ महत्व रखता है, मुझे मुम्बई फ़िल्म जगत को बॉलीवुड लिखना पसन्द नही है क्योकि यह नाम नकल किया गया है अमेरिका के हॉलीवुड से , फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए बॉलीवुड लिख देता हूँ
अब जब कि हम भारतीय सिनेमा के शतक की ओर अग्रसर है, तब कुछ खास सालों के जिक्र तो बनना ही हैं,,,
एक पाठक ने मेरे फेसबुक पेज पर यह गुज़ारिश के साथ सवाल उठाया था कि
“1960 को क्यो बॉलीवुड का अति महत्वपूर्ण साल माना जाता है”
इस साल ने न केवल कमाई दी, वरन नए कलाकारों का उदय के साथ गीतकार, संगीतकारों, कुछ नए विषय फिल्मों के भी दिए, साथ ही कुछ फिल्में ऐसी भी आई जिन्होंने इतिहास रच रखा हैं,
1860 तक महाराष्ट्र दो राज्यो में विभाजित था, महाराष्ट्र और गुजरात लेकिन 1960 में मुम्बई को महाराष्ट्र की राजधानी बना दिया गया था,
देश के विभाजन के पहले फिल्में तीन शहरों में बना करती थी
मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री
कोलकाता फ़िल्म इंडस्ट्री
लाहौर फ़िल्म इंडस्ट्री
1960 में मुम्बई को राजधानी बनने से आर्थिक और राजनीतिक लाभ होने लगा था, फ़िल्म उद्योग उछल कर बाहर आया,
एक फ़िल्म इस साल प्रदर्शित हुई थी जिसे बनने में 15 साल लगे थे, लेकिन फ़िल्म प्रदर्शन के साथ ही मुम्बई फ़िल्म उद्योग में एक नई आभा जाग उठी थी फ़िल्म थी – मुग़ले आज़म ( के आसिफ, पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, मधुबाला, हामिद अली उर्फ अज़ीत) यह फ़िल्म भारतीय चित्रपट के लिए मील का पत्थर साबित हुई थी,
भव्यता, विहंगमता, अकल्पनीय फ़िल्म- गीत संगीत, सँवाद, अदाकार, निर्देशन, कला निर्देशन फ़िल्म के सभी आयामो पर सो फीसदी काम किया गया, जनता का स्नेह, प्यार, आत्मीयता भी वैसी ही मिली,
***(इस फ़िल्म के लिए एक लेख अलग से लिखना बनता है, )
गांने
प्यार किया तो डरना क्या,,,
तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर,,,
आज तक कालजयी कृति में शुमार है
इसी साल में संगीतमयी कुछ फिल्में और आई जैसे
चौदहवी का चांद, बरसात की रात, जिस देश मे गंगा बहती है, दील अपना प्रीत पराई, जाली नोट, बम्बई का बाबू, काला बाजार, छलिया, हम हिंदुस्तानी,
इन फिल्मों में संगीत देने वाले नोशाद, शंकर जय किशन, एस डी बर्मन, कल्याण- आनन्द जी थे,
इन गांनो को सदाबहार बनाने के लिए संगीतकारो के साथ गीतकारों का भी उतना ही कमाल था,
उस साल सबसे सफल गीतकार थे साहिर, शैलेन्द्र, कमर जलालाबादी, शकील बदायू, प्रेम धवन, असद भोपाली, कुछ गाने मेहंदी अली खान, एस एस बिहारी ने लिखे थे,
कुछ बेहतरीन सदाबहार नगमो की बात करे
ज़िन्दगी भर नही भूलेगी ये बरसात की रात,,,,
अजीब दास्तां है ये कहा शुरू कहां खतम,,,
खोया खोया चांद,
प्यार किया तो डरना क्या- कोई चोरी नही की ,,,,
एक फ़िल्म मुस्लिम धर्म के विषय पर बनी चोदहवी का चांद, त्रिकोणीय प्रीम कहानी थी जिसमे गुरूदत्त, वहीदा रहमान, रहमान थे , रवि द्वारा संगीतबद्ध, शकील द्वारा लिखित गाना चौहदवीं का चांद हो ,,,,, आज तक एवरग्रीन गांनो में शूमार है,
बरसात की एक रात में एक कव्वाली ये इश्क इश्क है,,, इसे लिखा था साहिर ने, स्वर दिए थे मन्नाडे, रफी साहब, आशा भोसले ने, संगीत रचा था रवि ने,
1960 की बात हो और भरतीय सिनेमा की त्रिमूर्ति – दिलीप कुमार, रज कपूर, देव आनंद की बात न हो तो लेख अधुरा ही रह जाएगा,
अविरत ,,,,,,,,
शेष भाग —2 में
त्रिमूर्ति की चर्चा के साथ आलेख का शेष-अंतिम भाग अगले आलेख में ,,,

फ़िल्म समीक्षक: इदरीस खत्री

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