भारत नही चाहता युद्ध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लद्दाख दौरा चर्चा का विषय बना हुआ है। अगर न्यूज़ चैनलों की बात करे तो ऐसा लगता है जैसे मोदी जवानो से मिलने नही , चीन के साथ युद्ध का शंखनाद करने गए हों । बैरहाल मोदी लद्दाख किस उद्देश्य से गये यह तो मोदी ही बता सकते है। लेकिन वर्तमान समय में चीन को लेकर देश में जो स्थिति है ऐसे समय में प्रधानमंत्री का अचानक लद्दाख-दौरा जवानों में नए जोश और ऊर्जा भरने वाला साबित हुवा, जिससे मोदी के अचानक लद्दाख दौरे का उद्देश्य पूरा हो गया। वही चीन की तरफ से जो जवाब आया है।, उस पर हमारी सरकार को गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की जरूरत है। जिस तरह चीनी दूतावास और चीनी सरकार ने सधे हुए शब्दों का इस्तेमाल करके यह जता दिया है की वह अपनी हरकतों से बाज नही आने वाला इसलिए मोदी के लद्दाख दौरे के बाद भी चीन सरकार ने उत्तेजना और बयानबाजी न करते हुए अपनी सेना पीछे कर ली इसका अर्थ यह नही की चीन भारत के सामने नतमस्तक है।इतिहास गवाह है 1962 में चीन ने अपनी सेना पीछे की और इसके तीन महीने बाद ही चीन और भारत का युद्ध शुरू हो गया।चीन पर भरोसा अपने पैर पर कुल्हाड़ी, हमें चीन का स्वभाव नही भूलना चाहिए जिसका राष्ट्रीय स्वभाव ही ड्रेगन का है।जो तरह तरह की कुंडली बनाता है ।यह सभी जानते है की इसके पहले भी चीन कब्जा करने से पहले कुनीतिक वार्ताओं में पीछे हटा है। और हमारी संवेदना कहे या हमारी असावधानी के एक पल पर हमारी सिमा में घुसकर जमीन हथियाता रहा है।जो एक ड्रेगन स्वभाव की विशेषता है।चीन की यह अविश्वसनीय ता को हमें लगातार अपनी दृष्टि में रखना चाहिए। ऐसे समय में जब दोनों देश सीमा को लेकर आमने सामने है।और चीन पर विस्तार करने का आरोप है। इसके बाद भी चीन की चुप्पी के कई मायने निकलते है।या फिर चीन युद्ध जैसी स्थिति से निपटने को तैयार है।या फिर उसे इस बात के मुगालते है की वह भारत के साथ भी कूटनीतिक वार्तालाप करके समस्या का समाधान कर लेगा। एक तरफ चीन को अपने पड़ोसी देशों के साथ बातचीत कर हल निकालने में महारत हासिल है। वही मौजूदा हालात में भारत सरकार भी चीन के साथ युद्ध छेड़ने के पक्ष में नहीं है। वह भी चीन के साथ बातचीत के रास्ते हल निकालने को ही बेहतर समझती है। इसीलिए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा दूरदर्शी, शब्दबाण चलाने वाला नेता भी चीन की कुटिनित को भलीभांति समझता है।तभी तो चीन को लेकर अपने भाषणों में बिना किसी का नाम लिए समाधान की बात करता है।क्योकि मोदी को युद्ध के दुर्गामी परिणाम अच्छे से ज्ञात है। मोदी एक दूरदर्शी नेता है उनका लक्ष्य जवानों में नया जोश नई ऊर्जा भरना है। न की चीन को उत्तेजित करना, और न ही युद्ध का शंखनाद करना उनका लक्ष्य तो अपने जवानों में ऊर्जा भरना और उनके घावों पर मरहम लगाना है और दूसरा, देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है।मोदी जानते है की चीन के दूसरे आक्रमणों पर भी सावधानी के साथ साथ चीन को प्रत्युत्तर कैसे देना है।जैसा की मैंने कहा मोदी एक दूरदर्शी नेता है।वह जानते है की चीन सिर्फ मोबाइल एप के जरिये ही नही बल्कि हमारे खाद्य तंत्र को भी विषाक्त बना रहा है।भारत मे पैदा होने वाले फल,सब्जियों को कृतिम तरीके से पकाने और उसके स्वाद को मीठा बनाने में जिन रसायनों का स्तेमाल होता है।उस रसायनों की लगभग सम्पूर्ण आपूर्ति चीन से ही होती है।यह मोदी को भलीभांति ज्ञात है।इसलिए मोदी युद्ध के बाजए देश की आर्थिक स्थिति आत्मनिर्भता पर जोर दे रहे।मोदी को पता है की देशवादियों के मनोबल को गिरने नहीं देना, इस कोरोना काल मे देश जिस आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से गुजर रहा है ऐसी परिस्थिति में मोदी के लिए चीन की चुनौती से बड़ी तो अंदरुनी चुनौती है। जो विरोधी दल के रूप में सामने है।और सभी को पता है की अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो कौन कौन से देश भारत के साथ खड़े होंगे।और इसके परिणाम क्या होंगे। ऐसे में मोदी के सामने अंदरूनी चुनौती से निपटना मुश्किल होगा। मोदी एक दूरदर्शी नेता है वह जानते है की अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो अमेरिका के अलावा भारत का साथ देने के लिए एक देश भी आगे आनेवाला नहीं है। अमेरिका भी इसलिए खुलकर भारत के पक्ष में बोल रहा है क्योंकि अमेरिका और चीन आमने सामने है। लेकिन युद्ध की स्थिति में अमेरिका पर पूर्ण रूप से विस्वास नही किया जा सकता ।क्योंकि समय समय पर अमेरिका भी अपने रंग दिखाने से बाज नहीं आता। और रही अन्य देशों की बात तो चीन के सामने सभी बौने हो जाते है।इसी का फायदा उठाकर चीन विस्तार पर विस्तार करता जा रहा। दुनिया के अन्य देश जैसे फ्रांस ,जापान रूस आदि की बात करें तो सभी चीन को लेकर गोल मोल बयानबाजी करते है। क्या इनके दम पर मोदी चीन के साथ युद्ध का शंखनाद करेंगे ? रुस और फ्रांस ने भारत का साथ देने की बात जरूर कही है लेकिन इसके पीछे का सच कुछ और है। वह इसलिए भारत का साथ देने की बात कह रहे क्योकि हम उनसे अरबों रु. के हथियार खरीद रहे हैं। स्वाभाविक है उनकी करनी और कथनी में अंतर हो सकता है।ऐसे में चीन के साथ युद्ध का मतलब अपने दम पर युद्ध का शंखनाद होगा। भारत को जो कुछ भी करना है, अपने दम पर करना है।क्योकि चीन हमारे स्वार्थो में जिंदा है।………चीन पर भरोसा अपने पैर पर कुल्हाड़ी…..

लेखक :- शीतल रॉय

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