निजामुद्दीन मरकज़ से रानीपुरा तक कहानियां एक जैसी

इस संपादकीय के बाद शायद “प्रजातंत्र’ को सांप्रदायिक करार दे दिया जाए। कुछ लोग यह भी कहेंगे कि देखिए, यही है आजकल की हिंदी पत्रकारिता का असली चेहरा। जिसमें मुसलमानों पर निशाना साधा जा रहा है। इन अखबारों को पढ़ना बंद कर दीजिए। जैसे हमने बरसों पोलियो के टीके नहीं लगवाए और जैसे महामारी के इस दौर में हम अपनी बीमारी छिपाकर घरेलू इलाज से उसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं, वही कीजिए।
जब पूरा शहर महामारी के मुहाने पर खड़ा है और सबसे ज्यादा बीमारी का कहर उन सघन मुस्लिम बस्तियों में है, जहां न तो पर्याप्त सुरक्षा है और न ही लोग बीमारी और बीमारों का पता बताने को तैयार हैं- इस बात को साफ तौर पर समझ लीजिए कि आपकी जिद के चलते इंदौर शहर की जनता खुद को दांव पर लगाने को तैयार नहीं है। और इसमें वे मुस्लिम भी शामिल हैं, जो आपको समझा-समझाकर परेशान हो गए। आफत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि पढ़े-लिखों से ज्यादा आपके दिमाग पर वे लोग असर डाल रहे हैं, जो कभी स्कूल नहीं गए और मजहब की घुट्‌टी पिला-पिलाकर जिन्होंने अपनी टपरी सजाई हुई है।
कल अलग-अलग जगहों से तीन वीडियो मोबाइल पर आए थे। पहला उन मौलाना का था, जो इस बात पर बहस कर रहे थे कि मस्जिद में 15 लोग इकट्‌ठा हो जाएंगे तो क्या हो जाएगा? क्योंकि सरकारी अमले के आप लोग जो हमें रोकने आए हैं, आप भी तो 15 हैं। इस मौलाना की बुद्धि में सूराख कर कोई कैसे समझाए कि ये अपनी जान पर खेलकर आए हैं, ताकि तुम्हारी जान बचा सकें।
दूसरा वीडियो उत्तर प्रदेश का था, जिसमें 15-20 लोग एक बंद कमरेनुमा जगह पर प्रतिबंध होने के बावजूद नमाज पढ़ रहे हैं। नमाज पढ़ने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब प्रशासन कह रहा है इकट्‌ठा मत होइए, यह कानून का उल्लंघन है तो कानून को तोड़कर महामारी के दौर में सिर्फ मस्जिद जाकर ही इबादत करने को ईश्वर भी मंजूर नहीं करेगा। यहां सवाल सिर्फ उन लोगों का नहीं था, जो इकट्‌ठा हुए थे। बल्कि उन लोगों का है, जिन्हें इनमें से कोई भी वायरस दे सकता है। यहां एक छोटा बच्चा भी था और काफी जगह होने के बावजूद सब इतने नजदीक बैठे थे कि जैसे उस कमरे की चौखट पर पहले ही महामारी को फूंक मारकर बाहर बांध दिया गया हो। क्या आप देश के कानून से ऊपर हैं? और जब उसका पालन करवाया जाए तो आप कहने लगते हैं कि देखिए, ये जालिम सरकार कैसे मजलूमों पर कहर ढा रही है!
डंडे तो पड़ेंगे, फिर आप मुस्लिम हों या हिंदू। आपकी मूर्खता का खामियाजा बाकी सारे हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई नहीं भुगतेंगे। बुजुर्ग नहीं भुगतेंगे, बच्चे नहीं भुगतेंगे। अगर लॉकडाउन के बाद कुछ मूर्ख हिंदू जुलूस निकालेंगे तो उन्हें भी उतने ही डंडे पड़ेंगे जितने आपको लॉकडाउन तोड़कर इकट्‌ठा होने पर पड़ने चाहिए।
तीसरा और सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाला वीडियो इंदौर का था और उस इलाके का था, जहां से सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज मिल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम जब उनके घरों पर दस्तक दे रही थी तो आप उन पर थूक रहे थे, उन्हें गालियां दे रहे थे, उन्हें धमका रहे थे और इसका वीडियो बना रहे थे, ताकि बाकी लोगों को यह संदेश मिल जाए कि इन टीमों के साथ क्या करना है। और जब पुलिस-प्रशासन सख्ती करेगा तो आप जोर-जोर से रोने लगेंगे कि पहले तो सिर्फ दिल्ली ही थी, अब ये भी…।
ये “विक्टिम कार्ड’ खेलना बंद करिए। इलाज कराइए। दिमाग का भी और कोरोना का भी। कोरोना से पहले दिमाग का। क्योंकि पिछले कुछ सालों में जैसे-जैसे उनके पाजामे की लंबाई इंच-दर-इंच कम होती गई है, आपने मौलाना आजाद से लेकर जावेद अख्तर और डॉ. अब्दुल कलाम से लेकर मौलाना वहीदुद्दीन खान तक की नसीहतों को खुद से दूर कर लिया है और कठमुल्लों ने उल्टे उन्हें जाहिलों की श्रेणी में डाल दिया है। सबको छोड़िए, अपनी मुकद्दस किताब को एक बार फिर पढ़िए। वह विज्ञान की बात करती है, वह इनसानियत की बात करती है। और जब-जब अंधेरा घना हो, उससे बाहर कैसे निकला जाए इसकी बात करती है।
इस बात को भी साफ तौर पर समझ लीजिए कि बीमारी का धुआं आपके घर से निकलकर आसपास फैल रहा है। अभी तो दरवाजे बंद हैं, लेकिन जब ये आपकी गलतियों के कारण दूर दूसरों के घरों में घुसने लगेगा तो फिर हिंदू या मुस्लिम सब अपने दरवाजे खोलेंगे और यह धुआं बुझाने निकलेंगे।
याद रखिए… धुआं आंखों में सिर्फ पानी लाता है। बिना यह देखे कि आंखें हिंदू की हैं या मुसलमान की। लिहाजा अपने तईं पूरी कोशिश कीजिए कि आप इस खूबसूरत दुनिया को बचाने में क्या भूमिका निभा सकते हैं।
लेखक :- हेमंत शर्मा

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