भागीरथपुरा, इंदौर में दूषित जल के कारण लगभग तेरह लोगों की मौत की घटना ने मध्य प्रदेश शासन पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसी त्रासदियों में जनता का पहला प्रश्न स्वाभाविक होता है। गलती कहाँ हुई और जिम्मेदारी कौन लेगा। इसी संदर्भ में जब एक पत्रकार ने सवाल उठाया, तो नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की प्रतिक्रिया ने लोकतांत्रिक संवाद की मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी। कथित तौर पर उन्होंने “घंटा” जैसे शब्दों का प्रयोग किया, जो सामान्य शिष्टाचार की सीमा लांघता प्रतीत हुआ। यह शब्द केवल असंयमित भाषा नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार का प्रतीक बनकर सामने आया।
लोकतंत्र में पत्रकार सवाल इसलिए पूछते हैं ताकि जनता तक सच पहुँचे और व्यवस्था अपनी खामियों को दुरुस्त करे। ऐसे में सवालों से तिलमिलाकर अपमानजनक भाषा का सहारा लेना, जवाबदेही से बचने का संकेत देता है। “घंटा” जैसे शब्द, जिन्हें आम बोलचाल में गाली या तिरस्कार के रूप में समझा जाता है, किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की जुबान पर शोभा नहीं देते। भाषा केवल शब्दों का चयन नहीं होती, वह सोच और संवेदना का आईना भी होती है। जब भाषा कठोर होती है, तो संवेदना का अभाव झलकता है।
दूषित जल से मौतें कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं मानी जा सकतीं। पानी की आपूर्ति, शुद्धिकरण और निगरानी,ये सभी प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं। यदि इन जिम्मेदारियों में चूक हुई है तो उसको स्वीकार करना चाहिए इसके उलट, सवाल पूछने वाले पत्रकार पर ही बरस पड़ना सत्ता की असहजता को उजागर करता है। ऐसा व्यवहार सरकार की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जो अपनी गलतियों को स्वीकारने के बजाय आलोचना को दबाने की कोशिश करती है। राजनीति में अहंकार नया नहीं है, परंतु हर त्रासदी उसे और नंगा कर देती है। जनता को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। अपशब्दों से सच्चाई नहीं बदलती, न ही पीड़ितों का दुःख कम होता है। उलटे, इससे सरकार और जनता के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती है। लोकतंत्र में ताकत का असली प्रमाण संयम, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता है न कि ऊँची आवाज या तिरस्कारपूर्ण शब्द। इस पूरे प्रसंग से एक ही सबक निकलता है: सत्ता में बैठे लोगों की भाषा और व्यवहार का सीधा असर समाज पर पड़ता है। जब मंत्री स्तर के व्यक्ति सार्वजनिक रूप से मर्यादा तोड़ते हैं, तो यह संदेश जाता है कि जवाबदेही गौण है। समय की मांग है कि सरकार इस घटना की निष्पक्ष जांच कराए, दोषियों पर कार्रवाई करे और सार्वजनिक मंचों पर भाषा की गरिमा बनाए रखे। तभी लोकतंत्र का भरोसा कायम रहेगा और पीड़ितों को न्याय की उम्मीद।
लेखक :- राजेश्वर त्रिवेदी, स्वतंत्र पत्रकार



