रविवार

काश.. आज फिर रविवार होता…
सो जाती फिर से… मुह ढांप के…
करवट भी न बदलती… फिर तो…
सोती रहती तान के…
खोयी रहती… मै तो…
निद्रा के आगोश में…
पावों को क्यूँ मैला करूंगी
देखूंगी ख्वाब मजेदार से…
बाहर तो है घुप्प अँधेरा…
भीतर है आनंद का बसेरा…
नफरत की कालिख से बच लूं…
अंतर के कैनवास को रंग लूं
अनिद्रा के स्वप्न भयंकर…
टूटे कहीं छनाक से…
बाहर है बस मरुधरा…
भीतर है… हरसिंगार रे…
नैनों के ना निकट आये…
कलुषित हृदय जमात के…
भीतर ही भीतर बनते हैं…
सीपी मोती नाज़ से…

Author: Jyotsna Saxena (ज्योत्सना सक्सेना)

  • Related Posts

    ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं

    ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं,है अपना ये त्यौहार नहींहै अपनी ये तो रीत नहीं,है अपना ये व्यवहार नहींधरा ठिठुरती है सर्दी से,आकाश में कोहरा गहरा हैबाग़ बाज़ारों की सरहद…

    इंसान सिमट गए पैसों में

    खो गईं वो चिठ्ठियाँ जिसमें “लिखने के सलीके” छुपे होते थे, “कुशलता” की कामना से शुरू होते थे। बडों के “चरण स्पर्श” पर खत्म होते थे…!! “और बीच में लिखी…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    सेक्स के अलावा भी कंडोम का उपयोग है?

    सेक्स के अलावा भी कंडोम का उपयोग है?

    शीघ्रपतन से छुटकारा, अपनाएं ये घरेलु उपाय

    शीघ्रपतन से छुटकारा, अपनाएं ये घरेलु उपाय

    सेक्स के लिए बाहर क्यूं मुंह मारते है पुरुष ?

    सेक्स के लिए बाहर क्यूं मुंह मारते है पुरुष ?

    गर्भनिरोधक गोलियों के बिना भी कैसे बचें अनचाही प्रेग्नेंसी से ?

    गर्भनिरोधक गोलियों के बिना भी कैसे बचें अनचाही प्रेग्नेंसी से ?

    कुछ ही मिनटों में योनि कैसे टाइट करें !

    कुछ ही मिनटों में योनि कैसे टाइट करें !

    दिनभर ब्रा पहने रहने के ये साइड-इफेक्ट

    दिनभर ब्रा पहने रहने के ये साइड-इफेक्ट