कहाँ जा रही हो छोड़ कर राह मेँ मुझे इस तरह माँ
अभी तक तो मैँने चलना भी नही सीखा
अरे मुरझाया हुआ फूल हूँ मै तो
अभी तक तो मैँने खिलना भी नही सीखा
खेल खेल मेँ गिर जाऊ तो कौन साहारा देगा मुझे
मैने तो अभी उछलना भी नही सीखा
चल दी हो तुम कहाँ अकेला कर के मुझे
घर से अकेला अभी तक निकलना भी नही सीखा
कौन पोछेगा मेरे आँसू जब भी तेरी याद मेँ रोया तो
अभी तक तो मैने सम्भलना भी नही सीखा
देगा कौन अपने आँचल की छाँव इस तपती धूप मेँ तेरे सिवा
अभी तक तो मैने जलना भी नही सीखा.
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं,है अपना ये त्यौहार नहींहै अपनी ये तो रीत नहीं,है अपना ये व्यवहार नहींधरा ठिठुरती है सर्दी से,आकाश में कोहरा गहरा हैबाग़ बाज़ारों की सरहद…




