बुढ़ापे की वो सुबह

सुबह का सन्नाटा था, लेकिन निगम साहब के घर में मानो तूफान आ गया था। घड़ी की सुइयाँ पाँच के करीब पहुँच रही थीं और निगम साहब पिछले बीस मिनट से घर के हर कोने को उलट-पुलट कर रहे थे। कभी स्टडी टेबल की किताबें बिखेरते, तो कभी ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर सामान इधर-उधर करते। उनके चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी—उनका दूर का चश्मा गायब था।

“ये कहाँ चला गया?” वे बड़बड़ाए और तेज़ी से डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़े, लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी।

इधर, शोर से अनजान मिसेज निगम गहरी नींद में थीं। आखिरकार जब आवाज़ें बढ़ीं, तो उनकी आँख खुल गई। नाराज़गी से भरी आवाज़ में उन्होंने कहा, “सुबह-सुबह क्या कोहराम मचा रखा है?”

निगम साहब लगभग दौड़ते हुए किचन में पहुँचे, “मेरा चश्मा नहीं मिल रहा! बिना उसके मुझे कुछ साफ नहीं दिखता!”

मिसेज निगम ने चाय चढ़ाते हुए तीखे स्वर में जवाब दिया, “तुम्हारा रोज का यही ड्रामा है! कभी जूते, कभी कैप, अब चश्मा! मैं क्या तुम्हारी चौकीदार हूँ?”

“प्लीज़, ढूंढ दो ना! मैं लेट हो रहा हूँ,” उन्होंने लगभग विनती करते हुए कहा।

“लेट? किसके लिए? उन्हीं बुढ्ढे दोस्तों के लिए?” उन्होंने ताना मारा।

निगम साहब चुप हो गए। चाय लेकर दोनों लिविंग रूम में आ बैठे। कमरे में कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, फिर मिसेज निगम धीमे स्वर में बोलीं, “तुम जानते हो, जब तुम बाहर से कुंडी लगाकर चले जाते हो… तो मुझे बहुत डर लगता है। लगता है जैसे घर नहीं, कोई खाली खोल रह गया हो… और अगर कभी तुम लौटकर ना आए तो?”

उनकी आवाज़ कांप गई। यह सुनते ही निगम साहब के हाथ में पकड़ा कप हल्का सा कांप गया। पहली बार उन्हें अपनी आदत का असर समझ आया।

कुछ देर बाद मिसेज निगम उठीं और दो मिनट में चश्मा ढूंढकर उनके हाथ में रख दिया। “लो, मिल गया… लेकिन पहले चाय तो साथ पी लिया करो,” उन्होंने धीमे से कहा।

उस दिन निगम साहब बगीचे गए जरूर, लेकिन मन कहीं और ही भटका रहा। दोस्तों की बातें, हंसी-मजाक सब फीका लग रहा था। घर लौटकर भी वे चुपचाप रहे।

रात को उन्होंने सोने का नाटक किया, लेकिन आँखें खुली थीं। तभी उन्होंने देखा—मिसेज निगम धीरे से उठीं और उनकी वॉकिंग स्टिक उठाकर वॉशिंग मशीन के पीछे छिपा दी। उनके चेहरे पर हल्की शरारती मुस्कान थी।

निगम साहब सब समझ गए। उनके होंठों पर भी मुस्कान आ गई।

उन्होंने मन ही मन ठान लिया—अब हर सुबह की शुरुआत साथ की चाय से होगी, न कि अकेलेपन से।

अगली सुबह अलार्म नहीं, बल्कि रिश्ते की गर्माहट उन्हें जगाने वाली थी।

Related Posts

पराया माथे ट्राफिक में नंबर वन नी होंयगा

एक दन अपना स्कूटर से दफ्तर जई रयो थो कि पीछे से एक छोरो दनदनातो आयो ने एकदम से गाड़ी मोड़ दी। हूं गिरते -गिरते बचियो। म्हने उकासे कयो कि…

l भद्रकाली-का-वरदान l

केरल में नाराणतु भ्रांतन (पागल) के किस्से बहुत प्रसिद्ध हैं। वह वररुचि के पुत्र थे। उनके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं। किंतु वह सदा पागलों-सा वेष बनाए घूमते। भिक्षा माँगकर अपना…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

सेक्स के अलावा भी कंडोम का उपयोग है?

सेक्स के अलावा भी कंडोम का उपयोग है?

शीघ्रपतन से छुटकारा, अपनाएं ये घरेलु उपाय

शीघ्रपतन से छुटकारा, अपनाएं ये घरेलु उपाय

सेक्स के लिए बाहर क्यूं मुंह मारते है पुरुष ?

सेक्स के लिए बाहर क्यूं मुंह मारते है पुरुष ?

गर्भनिरोधक गोलियों के बिना भी कैसे बचें अनचाही प्रेग्नेंसी से ?

गर्भनिरोधक गोलियों के बिना भी कैसे बचें अनचाही प्रेग्नेंसी से ?

कुछ ही मिनटों में योनि कैसे टाइट करें !

कुछ ही मिनटों में योनि कैसे टाइट करें !

दिनभर ब्रा पहने रहने के ये साइड-इफेक्ट

दिनभर ब्रा पहने रहने के ये साइड-इफेक्ट