दो वक़्त की रोटी

काश दो वक़्त की रोटी सबके किस्मत में होती,
न होती कही छिना झपटी न होता देह व्यापार,
न टूटती सपनो की माला न बिखरते मोती,
काश दो वक़्त की रति सबके किस्मत में होती.
न होती इस तरह जिन्दगिया ख़राब ,
न होती युवा हाथो में शराब,
न सिसकता रहता बुढ़ापा, ‘जुगल’ न जवानी रोती,
काश दो वक़्त की रोटी सबके किस्मत में होती.
काश दो वक़्त की रोटी सबके किस्मत में होती.

Author: Pandit JugalKishore Sharma (पं. जुगलकिशोर शर्मा)

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