बधाई हो इंदौर, विकास जारी है!

बधाई इंदौर!

शुद्ध हवा, गौरैया, तीतर, गिद्ध और कौवों को गायब करने के बाद अब लगता है हम बारिश को भी गायब करने की और अग्रसर हैं।

कभी इंदौर की पहचान औसत से ज्यादा बारिश वाले शहर की थी। लेकिन इस बार मानसून विदा हुआ तो पीछे छोड़ गया 14 इंच कम बारिश। यानी अब चिंता सिर्फ अतिवृष्टि की नहीं है। बल्कि अब हम औसत बारिश भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं।

बधाई हो इंदौर, विकास जारी है!

पहले हवा बदली, फिर पानी की शुद्धता, गौरैया कम हुईं, गिद्ध गायब हुए, कौवों की आवाज अब सुनाई नहीं देती, पेड़ कम हुए, हरियाली घटी, खुली जमीन कम हुई, तालाब और प्राकृतिक जलस्रोत दबाव में आए और अब अंततः बारिश भी कम हो गई।

आज सवाल सिर्फ यह नहीं कि बारिश कम क्यों हुई? सवाल यह है कि क्या हमने बारिश और उसे संभालने की अपनी क्षमता को कम कर दिया है?

आज बारिश ज्यादा हो तो जलभराव, कम हो तो जलसंकट, कुछ दिनों में ज्यादा गिर जाए तो बाढ़ जैसी स्थिति, कम हो जाए तो पानी बचाने की अपील।

शहर बढ़ा, कंक्रीट बढ़ा, खुली जमीन घटी, प्राकृतिक जलधाराओं पर दबाव बढ़ा और बारिश के पानी को जमीन में उतारने से ज्यादा हमने उसे तेजी से शहर से बाहर निकालने पर भरोसा किया।फिर गर्मी आई और पूछा पानी गया कहां? शायद पानी कहीं गया नहीं, हमने ही उसे रुकने नहीं दिया।

14 इंच कम बारिश सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। असल में एक गहरा सवाल है कि क्या हमारा शहर बदलते मौसम और अनिश्चित बारिश के लिए तैयार है?

पेड़ कहां बचेंगे? तालाब कहां बचेंगे? खुली जमीन कहां बचेगी? भूजल रिचार्ज कहां होगा और बारिश का पानी जमीन के भीतर कहां जाएगा?

हम Artificial Intelligence की बात कर रहे हैं, लेकिन Natural Intelligence को समझने में पीछे जा रहे हैं। प्रकृति ने हजारों साल में जो जलधाराएं बनाईं, जो तालाब बनाए, जो पेड़ लगाए, जो मिट्टी बनाई। हमने कुछ दशकों में उन्हें निर्माण, विस्तार और विकास के नाम पर बदल दिया।

तो बधाई इंदौर!

गौरैया, कौवे कम हुए हमने ध्यान नहीं दिया।

पेड़ कटे हमने कहा, विकास जरूरी है।

तालाब सिकुड़े हमने कहा, शहर बढ़ रहा है।

खुली जमीन खत्म हुई हमने कहा, आबादी बढ़ रही है।

अब आसमान को दोष देने से पहले हमें जमीन की तरफ देखना होगा। क्योंकि बारिश के लिए सिर्फ बादल ही नहीं, बल्कि पेड़, तालाब, मिट्टी, खुली जमीन और प्रकृति को सांस लेने की जगह चाहिए।

कभी इंदौर औसत से ज्यादा बारिश पर खुश होता था। कहीं ऐसा न हो कि कल हम आंकड़े नहीं, बारिश की पुरानी कहानियां सुनाकर अगली पीढ़ी से कहें “बेटा, हमारे समय में इंदौर में खूब बारिश हुआ करती थी…”

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