“शक्ति विशिष्टाद्वैत के अनुसार शिव तत्व और शून्य”
सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर है बाकी सब गौण। एक शिव ही सृष्टि में सत्य है, वही क्रिया शक्ति, चित शक्ति एवं इच्छा शक्ति के रुप में अर्धनारीश्वर है, शिव के बायें भाग में शक्ति हैं, वही शिव के एक रुप है इच्छा, कमाना व क्रिया शक्तियों के द्वारा शिव ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शंभु रूप धारण करते हैं। इन तीन शक्तियों के लीन होने पर वे तुरीया अवस्था में निर्गुण परब्रह्म ही हैं।अर्थात् शिव व प्रत्यगात्मा में तादात्मय सम्बन्ध है। शक्तियों में भेद होने पर भी शक्तिमान शिव में अभेद है। जीव की जाग्रत, स्वप्न व सुषुप्ति अवस्थाओं से शून्य दशा में तथा शिव की निर्गुण दशा में कोई भेद नहीं है।
किसी भी धार्मिक संप्रदाय का दार्शनिक पक्ष होता है। पर उस दार्शनिक पक्ष को समझना इतना सरल नहीं होता। कवि इसी दार्शनिक पक्ष को सरल भाषा में कहते हैं। लेकिन यह फिर भी ज़रूरी नहीं कि वह ठीक-ठीक समझ में आ जाए। ऐसे पदों को समझने के लिए दार्शनिक पक्ष का समझना भी उतना ही आवश्यक है। अल्लम प्रभु ने अपने वचनों में ऐसा प्रयास किया है। इन वचनों से इतना तो समझ में आता है कि कवि अपने विश्वासों के दार्शनिक पक्ष की ओर सामान्य शिव भक्तों को उन्मुख अवश्य करते हैं। जहाँ वे किसी उदाहरण से बात को समझाते हैं- जैसे पहाड़ को कौन वस्त्र पहनाएगा आदि, तब तो बात तुरन्त समझ में आ जाती है, परन्तु जहाँ वे सूत्रात्मक शैली का प्रयोग करते हैं वहाँ दार्शनिक पक्ष की जानकारी आवश्यक बन जाती है।
शक्ति विशिष्टाद्वैत के अनुसार सभी कुछ शिव से निर्मित है और सभी कुछ उसी में विसर्जित होता है। यह संसार, इसमें पल्लवित जीवन तथा इसमें रही भावनाएं सभी कुछ के निर्माण का कारण यह पराशिव ही है, जो शून्य है। शून्य से सभी कुछ निर्मित हुआ है- यह वीरशैव तत्त्व है। अल्लम प्रभु कहते हैं कि शून्य का बीज है और शून्य की फसल है। अर्थात् शिव का बीज है और शिव की ही सृष्टि है। सभी जीवों में शिव का अंश है ही। जो कुछ इस सृष्टि में प्रकट है, दृश्यमान है वह उसी के रूप हैं। अंत में सभी कुछ इसी पराशिव में समाहित होता है। जो इस शून्य की आराधना करता है, उसकी मुक्ति तय है। वह फिर उस पराशिव में समाहित हो जाएगा। अतः अल्लम प्रभु कहते हैं कि हे गुहेश्वर तुझको मना कर, अपने विश्वास में लेकर, पतियाकर, मैं भी शून्य में समाहित हो जाऊँगा। अगर शिव शून्य है तो उसके अंश भी शून्य हैं। समाहित हो जाना इतना सरल नहीं है। जब तक गुहेश्वर की कृपा नहीं होगी।
शून्य अर्थात अवर्णनीय, अपरिमित , अविरल ( दुर्लभ ) अखंड , शाश्वत चित्त( चित्त -ज्ञान) शक्ति विशिष्ट शिव का अव्यक्त रूप, अनिर्वचनीय ( वाचा जिसे ना पकड़ पाए) अगोचर, सिद्धांत शिखा मणि में इस तत्व के लिए वर्णन आता है ..”अपरप्रत्यम (जो दूसरों को न दिखाया जा सके ) शान्तम ( शांत रूप ) प्रपंचैर अप्रपंचितम( रूप रस आदि प्रपंचैर गुणों की तरह जिसका वर्णन ना किया जा सके…वह इनसे नहीं जुड़ा है … ) निर्विकलाप्म ( कल्पना से परे ..जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ) अनानार्थम( अनेकानेक अर्थों से भी हम जिसका अर्थ ना कर सकें ) एततत्वश्च लक्षणं ( यह उस तत्व का लक्षण है)” .यह शिव तत्व ( शून्य तत्व ) बौद्ध दर्शन के शून्य तत्व जैसा नहीं है..यह कर्तुं अकर्तुम अन्यथा कर्तुं समर्थ है …यह पूर्ण का जन्म दाता है …अनंत पूर्नों को समाहित करने वाला है ) यह इच्छा कर सकता है …कामना कर सकता है ..और क्रिया करके त्रिगुणात्मक श्रृष्टि उत्पन्न कर सकता है।
दो शक्तियों से विवाह :-
१. इच्छा/ संकल्प शक्ति अर्थात दाक्षायनी / सती
२. क्रिया / धारणा शक्ति अर्थात उमा / पार्वती महाशिवरात्री को शून्य रूप शिव जी ने संकल्प किया… अर्थात दक्ष सुता (अहंकार के कारण उत्पन्न इच्छा शक्ति) से विवाह किया (शिव जी ऐसे शून्य हैं जिसमे पूर्ण भी समाहित है… तथा यह शून्य स्वयं को इच्छा करके बदल भी सकता है)…
दक्ष यज्ञ में दाक्षायनी का हवन कुंड में भस्मीभूत होना अर्थात शून्य रूप शिव जी की इच्छा को तप / साधना से और बल मिलना (तपः द्वंद् सह्नम)… दक्ष अहंकार (जो महाकारण शरीर में है /व्याप्त है) के प्रतीक हैं… उनकी कन्या इच्छा शक्ति / संकल्प शक्ति का भस्म होना अर्थात उसे साधना के माध्यम से क्रिया के लिए प्रेरित होना… क्रिया स्थूल शरीर का द्योतक है!
इच्छा दक्ष यज्ञ में भष्म होकर कामना रूप में प्रकट हुई!
इच्छा >>कामना >>क्रिया इच्छा >>>कामना( बलवती इच्छा , जो गुणात्मक रूप से बाल पूर्वक क्रिया करने की इच्छा….. जो इन्द्रियों को अपनी ओर खीचता है…. इन्द्रियों को बल पूर्वक कर्म करने की प्रेरणा देती है ) >>>क्रिया !
शिव जी द्वारा काम दहन अर्थात क्रिया शक्ति के लिए उत्प्रेरक प्रयत्न..काम शिव जी का सहयोगी है लीला के लिए ..क्रिया के लिए तत्पश्चात क्रिया / धारणा शक्ति अर्थात पार्वती से विवाह अर्थात क्रिया शक्ति के साथ संलग्नता …व पञ्च भूत की उत्पत्ति… स्थूल शरीर!
अहंकार—महाकारण शरीर इच्छा करना ( अहंकार के फलस्वरूप )—कारण शरीर कामना—सूक्ष्म शरीर क्रिया रूप में बदलना–स्थूल शरीर-..!!!




