किसका ठाकुर भारी? श्री राम या श्री कृष्ण?

जब ब्रज में सूरदास जी और तुलसीदास जी के बीच छिड़ गई एक प्यारी सी बहस! पढ़िए यह अद्भुत और रसपूर्ण कथा…

एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी, सूरदास जी से मिलने ब्रज पहुँचे। दोनों महान संतों ने एक-दूसरे की खूब प्रशंसा की और सत्संग किया। थोड़ी देर बाद तुलसीदास जी को हल्की सी शरारत सूझी…

उन्होंने सूरदास जी से कहा- “सूर बाबा! तुम कहाँ कन्हैया के चक्कर में पड़े हो? हमारे ठाकुर जी की शरण में आ जाओ। हमारा ठाकुर बहुत सीधा और वादे का पक्का है, तुम्हारा कन्हैया तो एक बात पर टिकता ही नहीं!”

सूरदास जी को यह बात थोड़ी चुभ गई। दोनों में ठन गई और यह तय हुआ कि आज तराजू पर तौल कर देखा जाएगा कि किसका ठाकुर भारी है! एक पेड़ पर तराजू लटकाया गया।

एक पलड़े में सूरदास जी अपने श्री कृष्ण की मूर्ति लेकर बैठे और बोले – “हे मेरे गोपाल जी, आज भक्त की लाज रखियो!”

दूसरे पलड़े में तुलसीदास जी श्री सीताराम की मूर्ति लेकर बैठे और बोले – “जय हो मेरे श्री सीताराम, भक्त की लाज रखना!”

तराजू थोड़ी देर ऊपर-नीचे हुआ और जब रुका… तो आश्चर्य! तुलसीदास जी का पलड़ा भारी निकला!

सूरदास जी को बहुत बुरा लगा। वे उदास होकर अपनी कुटिया में आए और श्री कृष्ण को उलाहना देने लगे- “प्रभो! मैंने जीवन भर आपसे कभी कुछ नहीं मांगा, सदा आपके ही गुण गाए, और आज आपने मेरी लाज नहीं रखी?”

भक्त की पुकार सुनकर उसी क्षण श्री कृष्ण प्रकट हुए! उन्होंने प्यार से सूरदास जी का चेहरा अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए बोले- “बाबा! इसमें मेरी क्या गलती है? दोष तुम व्यर्थ ही मुझे दे रहे हो!”

सूरदास जी थोड़े क्रोधित होकर बोले – “हाँ, सारी गलती मेरी ही है जो मैंने आपकी भक्ति की!”

तब कान्हा ने बड़ी मासूमियत से पूछा – “अच्छा बाबा, एक बात बताओ… दो लोग भारी होंगे या तीन लोग?”

सूरदास जी झुंझलाते हुए बोले – “अब मुझसे गिनती गिनवाओगे? जाहिर है तीन लोग भारी होंगे।”

श्री कृष्ण ने हँसते हुए उत्तर दिया- “तो तुमने तराजू में बैठकर क्या बोला? ‘हे गोपाल जी लाज रखियो!’ तो एक हुआ मैं और एक हुए तुम… कुल दो लोग!

और जब तुलसी बाबा बैठे, तो उन्होंने कहा ‘जय श्री सीताराम लाज रखियो!’ तो एक सीता जी, एक राम जी और तीसरे तुलसी बाबा… हो गए न तीन लोग!

अब तुम ही बताओ किसका पलड़ा भारी होगा? अगर तुमने ‘हे मेरे राधेश्याम’ कहा होता, तो तुम्हारे पलड़े में भी तीन लोग होते और पलड़ा बराबर रहता!”

यह मधुर बात सुनकर सूरदास जी को अपनी भूल समझ आ गई। उन्होंने तुरंत क्षमा माँगी, फिर से मूर्ति उठाई और बाहर आकर तुलसीदास जी से बोले- “तुलसीदास जी! चलो, एक बार फिर से वजन करते हैं!”

तुलसीदास जी मुस्कुराए, सारा खेल समझ गए और हँसते हुए बोले – “रहने दो बाबा! मुझे पता है तुम अभी किससे मिलकर और क्या सीख कर आ रहे हो!” इसके बाद दोनों महान संतों ने एक-दूसरे को प्रेम से गले लगा लिया। प्रेम से बोलो- “राधे राधे”

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