Poet’s Corner

A collection of Poems. . . .

मालवो म्हारो

मालवो म्हारो है घणो प्यारो | डग -डग नीर पग-पग रोटी | या वात वइगी अब खोटी | यां नी है मुरखां को टोटो | यां को खांपो भी है मगज में मोटो | थ्री -इडियट सनिमो आयो यां का खांपा, मूरख अणे टेपा के भायो | कदी कालिदास जिन्दो वेतो , तो ऊ घणो खुस वेतो | जो मगज …

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होली

नेह, प्रेम, अपनत्व ले, आया होली पर्व । हृदय-ह्रदय से मिल रहे, रंग कर रहे गर्व ।। अंतर्मन में हर्ष है, मन में है उल्लास । शोक रहे न शेष अब, बिखरे केवल हास ।। संस्कार पलनें लगें, गूजें ऐसे गीत । प्रीति-प्यार के बंध में, बंधना हमको मीत ।। कदम-कदम मिल बढ़ चलें, मिलें हाथ से हाथ । कृष्ण …

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डमरू वाला

विष बदल जाये अमृत की धारा तिरस्कृत को भी स्नेह अपारा जटाजूट मृगछाल को धारा है अनूठा सौंदर्य तुम्हारा जय शिवशंकर जय बम भोले जय जय जय डमरू वाला —– चाँद को माथे पे सजाया गंगा को सर पर बिठाया गले में सर्पमाल सजाया है अद्भुत रूप तुम्हारा जय शिवशंकर जय बम भोले जय जय जय डमरू वाला —– पार्वती …

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यह बिटिया प्यारी-सी

यह बिटिया प्यारी-सी लेकर जो खिलौना हाथ में एक सुन्दर-सा,,,, टहल रही है मेरे घर-आँगन के उपवन में , ज्यों थिरक रही हो कोई कलिका मंद हवा के झोंकों से किसी पौध की डाली में. होती है बिटिया घर-आँगन में झोंका एक अल्हड मस्त हवा का भी …. होकर स्फूर्त महकता रहता है जिससे मन जीवन भी उठता है थिरक-थिरक. …

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क्या सचमुच 'मैं' 'वह' नहीं हूँ , जो 'मैं' हूँ ?

शाम की गो-धूलि वेला में …. जब कर रही थी जुगलबंदी घर लौट रही गायों के गले में बंधी घंटियों की रुन-झुन मंदिरों की आरती में बज रही घंटियों के साथ , सोच रहा था मैं तब-भी और तब-भी जब प्रातः-वेला में तुलसी के चौबारे पर पूजा की थाली में दीप लिए मंगल-गान के साथ कर रही थी परिक्रमा मेरी …

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वह नन्हा पंछी

बूढ़े पेड़ के पास का पोखर सूखा था कल तक , रात के सन्नाटे में सुनकर पुकार दर्द से विव्हल पंछी की चाँद के आँसू बहे जब ओस बनकर सुबह देखा तो पोखर लबालब भरा हुआ था पानी से. ओट में सूखे पत्तों की तिनकों से बने एक जर्जर-से घोंसले में ठिठुरता हुआ ठण्ड से बैठा था कातर-सा वह नन्हा …

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''छोटी-सी प्यारी-सी नन्ही-सी बिटिया''

रह-रह कर याद आती है वह छोटी-सी प्यारी-सी नन्ही-सी बिटिया बहुत, बार-बार…. मन-ही-मन मुसकराने वाली सारी दुनिया से न्यारी वह कोमल-सी छुटकी-सी फूलों-सी बिटिया. प्रश्न उठता है यह बार-बार क्यों होती है बेटी भाव-प्रवीणा बेटों की तुलना में कोमल, कर्तव्य-अनुप्रेरित और सहृदय ? प्रश्न शाश्वत , उत्तर अब भी अनुत्तरित !!! त्रासद है फिर भी …. बेटी ‘बेटी’ ही रहती …

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''भोलापन तेरी आँखों का''

भोलापन तेरी आँखों का , क्यूँ उतर-उतर आता है तेरे रस-भीगे ओंठों में, शब्द जो निकलना चाहते हैं… सकुचाकर दबे-दबे से क्यों ठहर-ठहर जाते हैं, रह जाते हैं मेरे मनोभाव टकटकी लगाए से, सिहर-सिहर जाते हैं क्यों स्वप्न मेरे उतरकर मेरी आँखों से जाने को तेरी आँखों में ? Author: Dr. Surendra Yadav ( डॉ. सुरेन्द्र यादव )

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वह 'लड़की' याद आती है

उम्र की इस दहलीज पर जब देखकर हमें आईना भी बनाता है अपना मुँह, कुछ शरमाकर , कुछ इठलाकर मुसकराती-सी वह लड़की याद आती है …. जब हम भी थे कुछ उसी की तरह उसी की उम्र में…उसी की तरह सकुचाकर मुसकराने वाले. तब हम ऐसे थे…, जैसे कोई पंछी देखकर परछाई चाँद की जल में हो जाते थे बावले-से …

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फिर याद आ गए तुम

तारों के झिलमिलाते आँगन में अम्बर के अंतहीन ह्रदय में अंकित पूर्णिमा का चाँद देखते ही एक बार फिर याद आ गए तुम —- युगल पंछियों का नीड़ की ओर बढ़ना देख धरा की प्यास श्यामल पावसों का उमड़ना मुखरित हुआ अनूठा एहसास प्रतीक्षारत साँझ में एक बार फिर याद आ गए तुम —- चाँद की लरजती खूबसूरती में मुग्ध …

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